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"श्री अजीत पाटनी : सिर्फ नाम ही काफी था !"

"श्री अजीत पाटनी : सिर्फ नाम ही काफी था !" मैं आज भी विश्वास नहीं कर पा रहा हूँ कि श्री अजीत पाटनी अब इस दुनिया में नहीं हैं। दिगम्बर जैन समाज ने उनके चले जाने से एक जुझारू समर्पित समाजसेवी,पत्रकार खो दिया है। कोलकाता का नाम आये और  श्री अजीत पाटनी जी का स्मरण न हो ऐसा संभव ही नहीं था । मुझे दशलक्षणपर्व पर लगातार कई वर्षों तक कोलकाता के बड़े मंदिर में प्रवचन करने का अवसर प्राप्त हुआ था,उसी दौरान लगातार उनके साथ रहकर उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को करीब से जानने का अवसर भी मिला । मुझे आश्चर्य होता था कि वे बड़ी से बड़ी सामाजिक समस्या को चुटकियों में कैसे सुलझा देते थे ? उन्हीं दिनों के बाद से उनसे मेरी अक्सर बातचीत होती ही रहती थी । जब मैंने प्राकृत भाषा में समाचार पत्र "पागद-भासा"प्रकाशित किया तो उन्होंने बहुत प्रोत्साहित किया ।मुझे पत्रकारिता का ज्यादा अनुभव न होने से इस कार्य में उन्होंने काफी सहयोग भी किया ।  जैनदर्शन से जुड़ी कोई भी जानकारी उन्हें चाहिए तो वे मुझसे अवश्य संपर्क करते थे । मैंने अनुभव किया कि वे व्यक्तिगत रूप से साम्प्रदायिक दृष्टिकोण के नहीं थे

सर्वधर्म समभाव मतलब क्या ?=डॉ अनेकांत कुमार जैन

गुरु  गोविन्द  सिंह  जी  की  ३५० वीं  जयंती  के  अवसर  पर 27 /12/2016  को  धर्म अध्ययन विभाग ,पंजाबी  विश्व विद्यालय  ,पटियाला  द्वारा  आयोजित  सर्व धर्म  समभाव  पर आधारित  राष्ट्रीय  सम्मेलन  के  उद्घाटन  में  प्रदत्त  मुख्य भाषण  का  सार   सर्वधर्म समभाव मतलब क्या ? डॉ अनेकांत कुमार जैन * धर्म एक होता है अनेक नहीं ,इसलिए सर्वधर्म शब्द कहने में मुझे हमेशा संकोच होता है ,जब एक ही है तो सर्व शब्द लगाने की आवश्यकता ही क्या है ? और समभाव ही तो धर्म है तो फिर अलग से इसके उच्चारण का क्या औचित्य है ? हाँ , यहाँ धर्म का अर्थ सम्प्रदाय से लगाया जा रहा है तो बात अलग है | फिर शीर्षक होना चाहिए ‘सर्व सम्प्रदाय अनुयायी समभाव’ |क्यों कि समभाव की आवश्यकता  सम्प्रदायों  को ज्यादा है  और उससे भी ज्यादा उनके अनुयायियों को उसकी आवश्यकता है | धर्म शब्द को अक्सर सीमित अर्थों में देखा जाता है इसीलिए समस्या हो जाती है | समन्वय का मतलब – ‘‘मैं जैन धर्म का अनुयायी हूँ , उन सभी लोगों की मैं चिंता करता हूँ जो जैन हैं | मुझे आपकी भी चिंता हो सकती है ,आपसे मेरा कोई द्वेष नहीं है किन्तु आपके धर्म से

बना रहे बनारस

बना रहे बनारस डॉ अनेकांत कुमार जैन,नई दिल्ली   होली का तीन दिन का अवकाश , अचानक काशी यात्रा का कार्यक्रम और बनारस के रस की तड़फ ...सब कुछ ऐसा संयोग बना कि पहुँच ही गए काशी | इस बार बहुत समय बाद जाना हुआ | लगभग डेढ़ वर्ष बाद ...डर रहा था कि अपने बनारस को पहचान पाउँगा कि नहीं ? कहीं क्योटा न हो गयी हो काशी | भला करे भगवान् ....वही जगह , वैसे ही लोग वही संबोधन ...का बे ....का गुरु ..... ??? वाले और वे सारे स्वतः सिद्ध ह्रदय की निर्मलता से स्फुटित शब्द ..जिन्हें अन्यत्र अपशब्द कहा जाता है और कुटिलता में प्रयुक्त होता है   | दिल्ली की सपाट , साफ़ सुथरी किन्तु भयावह सड़कों को भुगतने के बाद ...काशी की उबड़ खाबड़ सड़कें और शिवाला के सड़क किनारे बने कूड़ा घर के बाहर लगभग आधे से अधिक सड़क भाग पर पसडा काशी का कूड़ा और आती दुर्गध भी मुझे उसी मूल काशी का लगातार अहसास करवा रहे थे और मैं  खुश था कि चाहे खोजवां हो , या कश्मीरीगंज , अस्सी हो या भदैनी या फिर लंका से लेकर नरिया होते हुए सुन्दरपुर सट्टी इनका सारा कूड़ा बाहर रहता है ...दिल के अन्दर नहीं | भारत के स्व.... अभियान की सारी शक्ति भी इस शहर में लग

आचार्य कुन्दकुन्द : एक झलक -डॉ अनेकांत कुमार जैन , नई दिल्ली

आचार्य कुन्दकुन्द : एक झलक       -डॉ अनेकांत कुमार जैन , नई दिल्ली श्रीमतो वर्धमानस्य वर्द्धमानस्य शासने |    श्री कोण्डकुन्द नामाभून्मूलसंघाग्रणी र्ग्रणी ।।                                                                                         -(श्रवणबेलगोला शिलालेख ५५/६९/४९२ ) आचार्य कुन्दकुन्द जैन परंपरा के एक ऐसे सर्व मान्य आचार्य हैं जिनके ग्रंथों का स्वाध्याय सभी सम्प्रदायों के स्वाध्यायी करते हैं | भगवान् महावीर की वाणी का सार और उनके आंतरिक आध्यात्म का रहस्य आपने अपनी कृतियों में उद्घाटित किया है | आचार्य कुन्दकुन्द को पढ़े बिना जैनदर्शन का हार्द समझ पाना मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव है | प्राप्त सूचनाओं के आधार पर उनका संक्षिप्त परिचय यहाँ प्रस्तुत है - १.मूलनाम – पद्मनन्दी, प्रसिद्ध नाम –आचार्य कुन्दकुन्द , अपर नाम - वक्रग्रीवाचार्य , एलाचार्य , गृद्धपिच्छाचार्य २.विभिन्न नामकरण का कारण- जन्मस्थान के नाम से इन्हें कुन्दकुन्द संज्ञा प्राप्त हुई । किंवदन्ति के अनुसार अधिक स्वाध्याय के फलस्वरूप ग्रीवा टेढ़ी हो जाने के कारण इन्हें वक्रग्रीव कहा गया। विदेह गमन

आधुनिक युग में श्रावकाचार : परिवर्तन सोच का

  आधुनिक युग में श्रावकाचार  : परिवर्तन सोच का हर धर्म या दर्शन के साथ उसकी आचार मीमांसा भी किसी न किसी रूप में प्रकट होती है।कोई भी धर्म या दर्शन समाज से पृथक होकर नहीं रह सकता। कोई भी समाज बिना आचार-मीमांसा के सभ्य नहीं हो सकता , इसलिए यह जरूरी समझा गया कि प्रत्येक धर्म-दर्शन व्यक्ति और समाज को एक आचार मीमांसा दे । सामाजिक व्यवस्था के संचालन के लिए तो यह जरूरी था ही साथ ही धर्म-दर्शन के मुख्य उद्देश्य मोक्ष के लिए भी अत्यन्त आवश्यक था । इस संदर्भ में जैन धर्म- दर्शन ने भी एक सशक्त आचार व्यवस्था व्यक्ति और समाज को दी। मूलत: निवृत्ति प्रधान धर्म होने के नाते जैन धर्म-दर्शन के सामने यह समस्या तो थी ही कि जिन सांसारिक दु:खों से निवृत्ति का उपाय बताने का वह यत्न कर रहे हैं उसी संसार और समाज की सुव्यवस्था के लिए कौन सी आचार-व्यवस्था दी जाये जो मुक्ति मार्ग में बाधक भी न हो और सामाजिक रीति-नीतियों और सभ्यताओं का सुसंचालन भी ढंग से चलता रहे । जैन आचार की वैचारिक पृष्ठभूमि - निश्चित रूप से जैन दार्शनिक ऐसी आचार व्यवस्था को जन्म नहीं दे सकते थे जिससे संसार बढ़े , प्रत्युत वे सं