Wednesday, June 24, 2015

अंतर्राष्ट्रीय जुगाड़ दिवस भी मनाया जाय

"अंतर्राष्ट्रीय जुगाड़ दिवस भी मनाया जाय"

"अंतर्राष्ट्रीय जुगाड़ दिवस भी मनाया जाय" क्यों कि योग का एक देसी अर्थ "जुगाड़" भी है |

दर्शन - "जुगाड़"

आसन -
इसका एक ही सिद्ध आसन है - " चाटुकारासन " |
ये सब नहीं कर सकते |


कौन कर सकता है ?-


इसके साधक योगियों में धैर्य,समता,चेहरे पर कृत्रिम मुस्कान,अविद्यमान गुणों की भी प्रशंसा करना,रात को दिन कहने की कला ,चरण स्पर्श आदि में महारथ,मौसम को भांपने की क्षमता और उसी के अनुकूल खुद का भी रंग बदलने का हुनर,किसी एक सिद्धांत पर अडिग न रहने का साहस,खुद की हर क्रिया को सही और तर्क सम्मत सिद्ध करने का पांडित्य आदि आदि विशेष गुण होते हैं |इनके अभाव में इसकी साधना नहीं की जा सकती |इसके लिए रीड़ की हड्डी में विशेष लचीलापन चाहिए |
मंत्र-

व्यर्थ की प्रशंसा इसका मूल मंत्र है| काव्य कला हो तो अधिक असरकारी हो जाता है|
इसके लाभ -

१.व्यक्ति सत्ता परिवर्तन जैसे तनावों से मुक्त रहता है |

२.सरकार चाहे जिसकी हो उसका कभी ट्रान्सफर आदि नहीं होता |वह अपदस्थ नहीं होता |सहज ही बड़े बड़े पद और सुविधाएँ मिल जाती हैं |

३.कार्यक्षेत्र में योग्यता की न्यूनता होने पर भी पदोन्नति शीघ्र प्राप्त हो जाती है |वरीयता क्रम भी कोई मायने नहीं रखता |
४.रिश्वत आदि खर्चे के बिना भी काम हो जाते हैं |बचत होती है |

५.इसके माध्यम से बड़े बड़े संत महात्मा,मंत्री,अधिकारी,कुलपति,उद्योगपति आदि को कुछ ही दिनों की साधना के बाद आसानी से अपने वश में करके लाभ प्राप्त किया जा सकता है |

विशेषताएं -
१.यह सभी देशों में चलता है पर भारत हमेशा से विश्व गुरु है |

२.यह गैर सांप्रदायिक है |सभी धर्मों में,धर्म संस्थाओं में समान रूप से मान्यता प्राप्त है |

३.सभी राजनीतिक दलों को यह स्वीकार्य है |

Thursday, June 18, 2015

"Celebrate The World Yoga day on 21 June with SAMAYIK YOG " GLOBAL- SAMAYIK सामायिक योग

  "Celebrate  The World Yoga day on 21 June with SAMAYIK YOG "


                                       GLOBAL- SAMAYIK


 1.चतुर्दिक वंदना करें।   
        
2. 27 श्वासोच्छवास में ९ बार णमोकारमंत्र पढ़ें।   
            
3. चत्तारि मंगल पाठ पढ़ें।

4.सुखासन में बैठकर संक्षिप्त प्रतिक्रमण करें।.....तस्स मिच्छा मे दुक्कडं । 

5.सामायिक काल के लिए समस्त परिग्रह,राग द्वेष,आहार आदि का प्रत्याख्यान (त्याग) करें।

6. सामायिक करें।अर्हं पद का ध्यान करें और ध्वनि करें।  
          
7. कायोत्सर्ग करें। ( भेद विज्ञान) 
               
8.  वन्दनासन में बैठ कर थोस्सामि... लोगस्स स्तवन का पाठ भावों के साथ करें। 

9. 27 श्वासोच्छवास में ९ बार णमोकारमंत्र पढकर संपन्न करें।
              

निवेदक -         JIN FOUNDATION, NEW DELHI  

Saturday, June 13, 2015

जैन योग की सुदीर्घ परंपरा- २१ जून को विश्व योग दिवस पर विशेष

२१ जून को विश्व योग दिवस पर विशेष
सादर प्रकाशनार्थ

"जैन योग की समृद्ध परंपरा"
                                                        -डॉ अनेकांत कुमार जैन 

योग भारत की विश्व को प्रमुख देन है | यूनेस्को ने २ ओक्टुबर को अहिंसा दिवस घोषित करने के बाद २१ जून को विश्व योग दिवस की घोषणा करके भारत के शाश्वत जीवन मूल्यों को अंतराष्ट्रिय रूप से स्वीकार किया है |इन दोनों ही दिवसों का भारत की प्राचीनतम जैन संस्कृति और दर्शन से बहुत गहरा सम्बन्ध है |श्रमण संस्कृति का मूल आधार ही अहिंसा और योग ध्यान साधना है |इस अवसर पर यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि जैन परंपरा में योग ध्यान की क्या परंपरा ,मान्यता और दर्शन है

जैन योग की प्राचीनता और आदि योगी

जैन योग का इतिहास बहुत प्राचीन है |प्राग ऐतिहासिक काल के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने जनता को सुखी होने के लिए योग करना सिखाया |मोहन जोदड़ो और हड़प्पा में जिन योगी जिन की प्रतिमा प्राप्त हुई है उनकी पहचान ऋषभदेव के रूप में की गयी है | मुहरों पर कायोत्सर्ग मुद्रा में योगी का चित्र प्राप्त हुआ है ,यह कायोत्सर्ग की मुद्रा जैन योग की प्रमुख विशेषता है |इतिहास गवाह है कि आज तक प्राचीन से प्राचीन और नयी से नयी जितनी भी जैन प्रतिमाएं मिलती हैं वे योगी मुद्रा में ही मिलती हैं | या तो वे खडगासन मुद्रा की हैं या फिर वे पद्मासन मुद्रा की हैं| खडगासन में ही कायोत्सर्ग मुद्रा उसका एक विशिष्ट रूप है | नासाग्र दृष्टि और शुक्ल ध्यान की अंतिम अवस्था का साक्षात् रूप इन प्रतिमाओं में देखने हो सहज ही मिलती है | इन परम योगी  वीतरागी सौम्य मुद्रा के दर्शन कर प्रत्येक जीव परम शांति का अनुभव करता है और इसी प्रकार योगी बन कर आत्मानुभूति को प्राप्त करना चाहता है

जैन योग की अवधारणा

अंतिम तीर्थंकर महावीर ने भी ऋषभ देव की योग साधना पद्धति को आगे बढ़ाते हुए सघन साधना की | उनका अनुकरण करते हुए उन्हीं के समान आज तक नग्न दिगंबर साधना करके लाखों योगी आचार्य और साधू हो गए जिन्होंने जैन योग साधना के द्वारा आत्मानुभूति को प्राप्त किया |जैन साधना पद्धति में योग और संवर एक ही अर्थ में प्रयुक्त हैं |प्रथम शताब्दी के आचार्य अध्यात्म योग विद्या के प्रतिष्ठापक आचार्य कुन्दकुन्द दक्षिण भारत के एक महान योगी थे उन्होंने प्राकृत भाषा में एक सूत्र दिया "आदा मे संवरो जोगो "अर्थात यह आत्मा ही संवर है और योग है |जैन तत्त्व विद्या में जो संवर तत्त्व है वह ही आज की योग शब्दावली का द्योतक है |


ध्यान की विशेषता

भगवान् महावीर ने ध्यान के बारे में एक नयी बात कही कि ध्यान सिर्फ सकारात्मक ही नहीं होता वह नकारात्मक भी होता है |दरअसल आत्मा को जैन परंपरा ज्ञान दर्शन स्वभावी मानती है |ज्ञान आत्मा का आत्मभूत लक्षण है ,किसी भी स्थिति में आत्मा और ज्ञान अलग नहीं होते और वह ज्ञान ही ध्यान है ,चूँकि आत्मा ज्ञान के बिना नहीं अतः वह ध्यान के बिना भी नहीं |पढ़कर आश्चर्य लगेगा कि कोई ध्यान मुद्रा में न बैठा हो तब भी ध्यान में रहता है |महावीर कहते हैं मनुष्य हर पल ध्यान में ही रहता है ,ध्यान के बिना वह रह नहीं सकता | ध्यान दो प्रकार के हैं नकारात्मक और सकारात्मक | आर्तध्यान और रौद्रध्यान नकारात्मक ध्यान हैं तथा धर्म ध्यान और शुक्लध्यान सकारात्मक ध्यान हैं |मनुष्य प्रायः नकारात्मक ध्यान में रहता है इसलिए दुखी है ,उसे यदि सच्चा सुख चाहिए तो उसे सकारात्मक ध्यान का अभ्यास करना चाहिए |वह चाहे तो धर्म ध्यान से शुभ की तरफ आगे बढ़ सकता है और शुक्ल ध्यान को प्राप्त कर निर्विकल्प दशा को प्राप्त कर सकता है | इस विषय की गहरी चर्चा जैन शास्त्रों में मिलती है |वर्तमान में आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा प्रवर्तित प्रेक्षाध्यान एवं जैन योग देश में तथा विदेशों में काफी लोकप्रिय हो रहा है |

जैनयोग के विविध आयाम –

भगवान् महावीर ने योग विद्या के माध्यम से कई साधना के कई नए आयाम निर्मित किये |जैसे भावना योग ,अनुप्रेक्षा,अध्यात्म योग ,आहार योग ,प्रतिमा योग, त्रिगुप्ति योग,पञ्चसमिति योग,षडआवश्यक योग , परिषह योग ,तपोयोग, सामायिक योग ,मंत्र योग ,लेश्या ध्यान,शुभोपयोग, शुद्धोपयोग , सल्लेखना और समाधि योग  आदि | एक साधारण गृहस्थ और मुनि की साधना पद्धति में भी भगवान् ने भेद किये हैं |साधक जब घर में रहता है तो उसकी साधना अलग प्रकार की है और जब वह गृह त्याग कर संन्यास ले लेता है तब उसकी साधना अधिक कठोर हो जाती है |आज भी जैन मुनियों की साधना और उनकी दिनचर्या उल्लेखनीय है |

जैन योग साहित्य -

जैन आचार्यों ने योग एवं ध्यान विषयक हजारों ग्रंथों का प्रणयन प्राकृत एवं संस्कृत भाषा में किया है |उनमें आचार्य कुन्दकुन्द के अध्यात्म योग विषयक पञ्च परमागम ,अष्टपाहुड, पूज्यपाद स्वामी का इष्टोपदेश,सर्वार्थसिद्धि ,आचार्य गुणभद्र का आत्मानुशासन,आचार्य शुभचन्द्र का ज्ञानार्नव,आचार्य हरिभद्र का योग बिंदु,योगदृष्टि समुच्चय आदि दर्जनों ग्रन्थ आचार्य योगेंदु देव की अमृताशीति,जोगसारु  आदि ,आचार्य हेमचन्द्र का योगदर्शन आदि प्रमुख हैं |आधुनिकयुग में भी आचार्य विद्यानंद जी ,आचार्य विद्यासागर जी ,आचार्य तुलसी ,आचार्य महाप्रज्ञ ,आचार्य शिवमुनि,आचार्य हीरा ,आचार्य देवेन्द्र मुनि,आचार्य आत्माराम आदि अनेकों संतों द्वारा तथा अनेक जैन अध्येताओं द्वारा जैन ध्यान योग पर काफी मात्र में शोध पूर्ण साहित्य का प्रकाशन हुआ है तथा निरंतर हो रहा है |

         भारतीय योग विद्या को श्रमण संस्कृति का योगदान इतना अधिक है कि उसकी उपेक्षा करके भारतीय योग विद्या के प्राण को नहीं समझा जा सकता |पाठ्यक्रमों में योग को पढ़ाते समय श्रमण संस्कृति की योग विद्या से भी अवश्य अवगत करवाना चाहिए |



Dr Anekant Kumar Jain / anekant76@gmail.com /09711397716

Thursday, April 16, 2015

सादर प्रकाशनार्थ- ‘युवा मनीषी डॉ अनेकांत जैन ने जापान में किया भारत का प्रतिनिधित्व’

सादर प्रकाशनार्थ
‘युवा मनीषी डॉ अनेकांत जैन ने जापान में किया भारत का प्रतिनिधित्व’
                                                                                    


अप्रैल,२०१५,टोक्यो ,जापान,Religions for peace,Japan द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में युवा राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित डॉ अनेकांत कुमार जैन(सहायकाचार्य,जैन दर्शन विभाग,श्रीलाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ ,नई दिल्ली) ने भारत की तरफ से जैन धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए वहां जैन धर्म दर्शन की प्राचीनता और अहिंसा अनेकांत के माध्यम से वैश्विक शांति की स्थापना में जैनधर्म के योगदान को रेखांकित किया तथा इन्हीं सिद्धांतों से विश्व की भावी दिशा तय करने पर ही सच्चे अर्थों में शांति स्थापित हो सकती है- इस बात को “Jainism :  way of peace” शीर्षक से अपने शोधपत्र के द्वारा व्याख्यान तथा विमर्श के माध्यम से प्रस्तुत किया | सम्मेलन में पूरी दुनिया के कई देशों से विभिन्न धर्मों के विद्वानों ने विश्व शांति के उपायों पर अपनी बात रखी |ज्ञातव्य है कि भारत से मात्र डॉ अनेकांत प्रतिनिधित्व कर रहे थे |डॉ जैन ने प्राकृत भाषा के णमोकार मंत्र से ही अपनी बात को रखना प्रारंम्भ किया | व्याख्यान के बाद सभी लोगों में जैन धर्म को जानने की उत्सुकता और अधिक बढ़ गयी तथा आरम्भ में उद्घाटन समारोह में जहाँ लोग विभिन्न धर्मों का नाम लेते समय जैन धर्म का उल्लेख भी नहीं कर रहे थे ,व्याख्यान के उपरांत समापन समारोह तक सभी विद्वान अपने वक्तव्यों में जैन धर्म का भी नामोल्लेख करने लगे,यह एक बड़ी उपलब्धि रही | डॉ जैन ने टोक्यो जैन संघ द्वारा आयोजित दो  विशिष्ट व्याख्यान समारोह में वहां की जैन समाज को प्राकृत भाषा के महत्व तथा जैन तत्वज्ञान के महत्व से परिचित भी करवाया | डॉ जैन इसके पूर्व ताइवान ,चाइना में आयोजित ऐसे ही एक विश्व सम्मेलन में जैन धर्म का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं |ज्ञातव्य है कि डॉ जैन B.INSTITUTE OF INDOLOGY,DELHI के शैक्षिक निदेशक प्रो.फूलचंद जैन प्रेमी जी तथा विदुषी डॉ मुन्नीपुष्पा जैन जी के ज्येष्ठ सुपुत्र हैं तथा प्राकृत भाषा के प्रथम समाचारपत्र “पागद-भासा“ के मानद सम्पादक हैं | डॉ जैन की इस महत्वपूर्ण यात्रा के लिए अनेक मनीषियों ,समाज श्रेष्ठियों तथा श्री निर्मल जी सेठी आदि  समाज के अनेक गणमान्य लोगों ने अग्रिम शुभकामनाये प्रदान की तथा कार्यक्रम की सफलता के बाद बधाईयाँ प्रदान की |
                                                          -अजीत पाटनी,कोलकाता
चित्र संलग्न 

Thursday, March 19, 2015

LORD MAHAVEERA

LORD  MAHAVEERA



                                                   Jainism is the oldest religion in India. The religion preached by Lord Mahaveera is not a new religion; it is the religion of the jinas who had gone before him and popularized the basic principles of the greatness of self. Mahaveera was the twenty fourth, i.e., the last Tirthankar. According to the tradition he attained Nirvan 605 years before the beginning of the Saka Era.By either mode of calculation the date comes to 527 B.C. Since the lord attained emancipation at the age of 72, his birth must have been around 599B.C.This makes Mahaveer a slightly elder contemporary of Buddha who probably lived about 567-487 B.C.
                       He was born on the 13th day of the bright half of the month of Chaitra in the year 599 B.C. His father Siddharth , King of the Jňātŗ clan in Vaisali. His Mother was Trishla, the daughter of Chetaka, a king of the Chetaka, a king of a Licchavi clan. She had another name Priyakarini.The Mahaveera was first named Vira but since his birth, as the kingdom began to attain greater Prosperity, he was called VARDHAMANA.In some texts he is called Jňātŗaputra. In the Buddhistic literature he is called Nātaputta.He was thus born with all the intellectual and spiritual gifts which marked him out as a great religious teacher. He was educated as a prince. He possessed a gifted personality and a brilliant intellect.
          He perceived that every living being had a soul with the same potentialities of greatness as his own; his conduct towards every living creature was full of compassion and love. The material comforts had no attraction for him. Self restraint was a way of life for him. He was sweet tempered and bore no ill-will for him.
                  Mahaveera took the vow of monk (Muni) when he was thirty years old .He moved to forest where he cast off his cloths and pulled out his hair with his own hands .He spends most of his time in penance in caves and forests, on hills and mountain peaks .He attempt KEVALYA JNANA after 12 years. He was the head of an excellent community of 14,000 monks , 36,000 Nuns(Aaryikas),10,0000 male lay votaries(Shravakas) and 30,0000 female lay votaries(Shravikas).The four groups designated as Muni(Sadhu),Aaryika(Sadhvi),Shravak and Shravika constitute the four fold order(Tirth) of Jainism.
                          The spiritual power and moral grandeur of mahaveer’s teaching impressed the masses. He made religion simple and natural , free from elaborates ritual complexities .His message of Non-violence ,truth , non-stealing, celibacy, non-possession and Anekant-syadvad is full of universal compassion . His teachings reflected the popular impulse towards internal beauty and harmony of the soul.
 Dr Anekant Kumar Jain  

           JIN FOUNDATION                          
A 93 / 7A , Jain Mandir Colony
Behind Nanda Hospital,Chattarpur Ext.
New Delhi-110074,


Wednesday, March 18, 2015

भगवान महावीर ने दिए व्यक्तित्व विकास के मूलसूत्र- डा. अनेकान्त कुमार जैन

भगवान महावीर ने दिए व्यक्तित्व विकास के मूलसूत्र
                                डा. अनेकान्त कुमार जैन
                        जैन धर्म में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव से लेकर चौबीसवें व अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर तक एक सुदीर्घ परंपरा रही है | भगवान महावीर का जन्म, ईसा से ५९९ वर्ष पूर्व, चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को, वैशाली गणतंत्र के, लिच्छिवी वंश के महाराज, श्री सिद्धार्थ और माता त्रिशला देवी के यहाँ हुआ था । वे स्वयं एक महान व्यक्तित्व के धनी थे | वे इतने आकर्षक तथा प्रभावशाली थे कि जो भी उन्हें देखता उनका हो जाता था | वे सिर्फ देखने में ही सुन्दर नहीं थे बल्कि उनका आध्यात्मिक व्यक्तित्व भी इतना निर्मल था कि उनके पास जाने मात्र से लोग अपनी सारी समस्याओं का समाधान पा जाते थे | उन्होंने सफल व्यक्तित्व के कई सूत्र दिए |  व्यक्तित्व व्यक्ति की मात्र अभिव्यक्ति नहीं है ,एक समग्र प्रक्रिया है | मनुष्य-चरित्र को परखना भी बड़ा कठिन कार्य है, किन्तु असम्भव नहीं है। कठिन वह केवल इसलिए नहीं है कि उसमें विविध तत्त्वों का मिश्रण है बल्कि इसलिए भी है कि नित्य नई परिस्थितियों के आघात-प्रतिघात से वह बदलता रहता है। वह चेतन वस्तु है। परिवर्तन उसका स्वभाव है। प्रयोगशाला की परीक्षण नली में रखकर उसका विश्लेषण नहीं किया जा सकता। उसके विश्लेषण का प्रयत्न सदियों से हो रहा है। हजारों वर्ष पहले भगवान महावीर ने  भी उसका विश्लेषण किया था। इन्हीं के द्वारा साक्षात् उपदिष्ट पवित्र वाणी को आचार्यों ने प्राकृत भाषा में लिपि बद्ध किया जिन्हें आगम कहा जाता है | इन आगमों में व्यक्ति के विकास लिए अनेक सूक्ष्म सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया है| इन दार्शनिक सिद्धांतों की गहराई में यदि हम जायेंगे तो हमें वो सूत्र प्राप्त होंगे जिनसे एक व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण होता है |
रत्नत्रय और व्यक्तित्व
भगवान महावीर ने रत्नत्रय का सिद्धांत व्यक्ति के मौलिक विकास में सहायक माना है | रत्नत्रय के तीन रत्न हैं-
१.सच्चा विश्वास /सही दृष्टि
२.सही  ज्ञान
३.सही आचरण
आध्यात्मिक दृष्टि से ये  सम्यक दर्शन ,सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र के नाम से जाने जाते हैं | भगवान महावीर ने ये माना है कि व्यक्तित्व का विकास सर्वांगीर्ण होना चाहिए| उसके लिए इन तीनों की आवश्यकता है |
१.सच्चा विश्वास /सही दृष्टि
व्यक्तित्व का सबसे बड़ा पहलु है कि आपकी दृष्टि कैसी है ?यदि आप अपने लक्ष्य के प्रति सही दृष्टिकोण नहीं रखते हैं या फिर उस पर या खुद पर विश्वास नहीं है तब लक्ष्य की शुरुआत ही नहीं हो सकती |आपका दृष्टिकोण   सही होना चाहिए | आपकी दृष्टि और विश्वास से आपकी आपके लक्ष्य के प्रति निष्ठा का पता चलता है |और उसी से निर्धारित होता है कि आपकी सफलता कितनी सुनिश्चित है |
२.सही  ज्ञान-
जैन धर्म कहता है सही विश्वास,निष्ठा तथा दृष्टि तो अनिवार्य है ही किन्तु मात्र यही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण नहीं करता है और ना ही मात्र इतने से लक्ष्य की प्राप्ति ही संभव है इसके साथ साथ हमें अपने लक्ष्य तक पहुचाने वाले उपायों का सही ज्ञान भी बहुत जरूरी है|सही ज्ञान के अभाव में हम लक्ष्य से भटक सकते हैं | लक्ष्य के बारे में हमारे पास सही तथा प्रामाणिक सूचनाएं भी होनी चाहिए|इसीलिए सम्यक ज्ञान बहुत जरूरी है | सही विश्वास /सही दृष्टि तथा सही ज्ञान एक साथ व्यक्ति में उत्पन्न होते हैं यह जैन दर्शन की तात्त्विक मान्यता है|



३.सही आचरण
सही विश्वास/निष्ठा/दृष्टि तथा सही ज्ञान भी हो गया किन्तु महावीर  कहते  है कि अभी भी आप पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पाए हैं | अभी सफर बाकी है ,आपका व्यक्तित्व पूर्ण नहीं हो पाया है | आप अपने लक्ष्य को तब तक नहीं प्राप्त कर सकते जब तक कि आप सही आचरण को प्राप्त नहीं कर लेते | जिस लक्ष्य पर हमें सच्चा विश्वास है साथ ही उसका तथा उसके रास्ते का सच्चा ज्ञान भी है किन्तु यदि उस रास्ते पर हम चलें नहीं तो क्या होगा ? क्या हम मंजिल तक पहुँच पायेगें ?नहीं | पथ पर सही तरीके से चलना सही आचरण है | सम्यक चारित्र ही हमारे व्यक्तित्व का अंतिम सोपान है |
यदि कोई यह माने कि सच्चा विश्वास मात्र सफलता दिला देगा या मात्र ज्ञान हमें सफल कर देगा या फिर विश्वास और ज्ञान से रहित मात्र आचरण हमे सफल बना देगा तो महावीर के अनुसार यह भ्रम मात्र है | ऐसी मान्यता एकांतवाद है जो हमें लक्ष्य से कभी नहीं मिलने देगी | रत्नत्रय की पूर्णता ही पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करती  है|
भगवान महावीर ने रत्नत्रय को आधार बनाकर अनेकान्त ,स्याद्वाद ,अहिंसा तथा अपरिग्रह ये चार प्रमुख सिद्धांत इस जगत को दिए जिनसे व्यक्ति के एक ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण हो सकता है जो स्वयं उसके लिए तो कल्याणकारी होगा ही साथ ही वह परिवार,समाज,राष्ट्र तथा सम्पूर्ण विश्व के लिए भी कल्याणकारी होगा| एक संपूर्ण और सफल व्यक्तित्व के लिए हमें भगवान महावीर ने निम्नलिखित सूत्र दिए –
       १.विचारों में अनेकांत
२.वाणी में  स्याद्वाद
३.आचार में अहिंसा
४.जीवन में अपरिग्रह   
अनेकांत-स्याद्वाद और व्यक्तित्व 
       भगवान महावीर ने अनेकान्त स्याद्वाद ये दो ऐसे सिद्धांत दिए जिसकी आज पूरे विश्व को जरूरत है | इससे पहले कि हम इसकी व्यवहारिक आवश्यकता और व्यक्तित्व विकास से सम्बंधित इसके आयामों को छुएं हम पहले इन सिद्धांतों के शास्त्रीय स्वरूपों पर ध्यान देंगे |
        अनेकान्त वस्तु के विराट स्वरुप को जानने का वह तरीका है ,जिसमें विवक्षित धर्म को जान कर भी अन्य धर्मों का निषेध नहीं किया जाता | उन्हें मात्र गौण या अविवक्षित कर दिया जाता है और इस प्रकार मुख्य- गौण भाव से सम्पूर्ण वस्तु का ज्ञान और उसका वर्णन हो जाता है|उसका कोई भी अंश कभी छूट नहीं पाता क्यों कि जिस समय जो धर्म विवक्षित रहता है उस समय वह धर्म मुख्य तथा अन्य शेष धर्म गौण रह जाते हैं|इस दृष्टि से जब मनुष्य अनंत धर्मात्मक वस्तु को स्पर्श करने लग जाता है तब वह विचार करता है कि हमें उस शैली में वचन विन्यास करना चाहिए जिसमें इस अनंत धर्मात्मक वस्तु का यथार्थ प्रतिपादन हो सके |उस निर्दोष वचन विन्यास की आवश्यकता ने ‘स्याद्वाद’ का आविष्कार कर दिया |इसमें लगा ‘स्यात्’ पद कथञ्चित् के अर्थ में प्रत्येक वाक्य के सापेक्ष होने की सूचना देता है |इस प्रकार अनेकान्त और स्याद्वाद में वाच्य-वाचक सम्बन्ध है | अनेकान्त की कथन पद्धति का नाम ही स्याद्वाद है |सत्य के प्रतिपादन में स्याद्वाद की शैली हमारे सारे संशय दूर कर सकती है|
व्यक्ति यदि किसी भी वस्तु, घटना या परिस्थिति के एक ही पहलु को देखता है और उससे इतर पक्ष को देख ही नहीं पाता तो यह उसके व्यक्तित्व की बहुत बड़ी कमजोरी मानी जायेगी | अनेकान्त के चिंतन के माध्यम से व्यक्ति के बहुआयामी दृष्टिकोण का विकास होता है | व्यक्ति जब यह समझने,देखने और सोचने लगता है कि एक ही वस्तु की अनेक दृष्टियों से ही सही व्याख्या की जा सकती है और किसी एक दृष्टि से देखने पर वस्तु का पूरा स्वरुप व्याख्यायित नहीं किया जा सकता तब उसके चिंतन का विकास होता है इसलिए महावीर कहते हैं कि चिंतन में अनेकान्त दृष्टि रखो |हमारी सोच हमारे व्यक्तित्व का सबसे बड़ा आइना है |हम जैसा चिंतन रखते है हमारा व्यक्तित्व भी वैसा ही बनता है |स्याद्वाद हमारी वाणी को मैनेज करता है |वो कहता है कि वाक्यविन्यास ऐसा हो जिसमें वस्तु,घटना या परिस्थिति का कोई भी पक्ष छूट ना जाये ,हमारी वाणी में सापेक्षता होनी चाहिए| विज्ञान कहता है जीभ पर लगी चोट सबसे जल्दी ठीक होती है और ज्ञान कहता है के जीभ से लगी चोट कभी ठीक नहीं होती|अपनी जीभ को मर्यादा और संयम में रखेंगे तो कभी किसी के कटाक्ष का सामना नहीं करना पड़ेगा|हमारी बोली हमारे व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण भाग है इसके द्वारा ही हम अपनी प्रभावक अभिव्यक्ति कर पाते हैं |इसीलिए भगवान महावीर  ने वाणी में स्याद्वाद की बात समझाई |
अहिंसा और व्यक्तित्व
भगवान महावीर की मूल शिक्षा है - ‘अहिंसा भगवान महावीर ने, अपने स्वयं के जीवन से, इसे वह प्रतिष्ठा दिलाई कि अहिंसा के साथ भगवान महावीर का नाम ऐसा जुड़ गया, कि दोनों को अलग कर ही नहीं सकते। अहिंसा का सीधा-साधा अर्थ करें, तो वह होगा कि, व्यावहारिक जीवन में, हम किसी को कष्ट नहीं पहुंचाएं, किसी प्राणी को अपने स्वार्थ के लिए दुःख न दें।आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत्’’ इस भावना के अनुसार, दूसरे व्यक्तियों से ऐसा व्यवहार करें, जैसा कि, हम उनसे अपने लिए अपेक्षा करते हैं। इतना ही नहीं, सभी जीव-जन्तुओं के प्रति अर्थात् पूरे प्राणी मात्र के प्रति, अहिंसा की भावना रखकर, किसी प्राणी की, अपने स्वार्थ व जीभ के स्वाद आदि के लिए, हत्या न तो करें और न ही करवाएं और हत्या से उत्पन्न वस्तुओं का भी उपभोग नहीं करें। हमारे आचार में अहिंसा हो तभी वह सम्पूर्ण व्यक्तित्व बन सकता है |
अपरिग्रह  और व्यक्तित्व
परिग्रह का अर्थ है संचय , अपरिग्रह यानी त्याग। परिग्रह तनाव और आसक्ति को जन्म देता है और यही फिर अनेक बाहरी समस्याओं का भी कारण बन जाता है। हम देख रहे हैं कि आधुनिक युग में परिग्रहवाद बहुत बढ़ता जा रहा है और इसीलिए मनुष्य अनेक मानसिक , आर्थिक , पारिवारिक समस्याओं से घिरता जा रहा है। ऐसे में महावीर का अपरिग्रहवाद ही मानव को शांति दे सकता है । विज्ञान ने 'परिग्रह' को बहुत अधिक बढ़ावा दिया है और 'परिग्रह' ही सामाजिक, आर्थिक अपराध का मूल कारण है। अपराध, हत्याएं, भ्रष्टाचार, दहेज प्रथा ये सभी 'परिग्रह' की देन हैं। भगवान महावीर ने कहा कि उतना रखो जितनी आवश्यकता है, यानी 'पेट भरो... पेटी नहीं।' यदि आज हम महावीर के इन सिद्घांतों को मान लें और इसका अनुसरण करें तो विश्व भर में सामाजिक खुशहाली होगी। और सारे विश्व में सच्चा समाजवाद स्थापित हो सकेगा।इसलिए जीवन में अपरिग्रह का सिद्धांत मनुष्य के व्यक्तित्व को सर्वोदयी बनाता है |

लेश्या और व्यक्तित्व
लेश्या हमारी चेतना से निकलने वाली विशेष प्रकार की रश्मियाँ हैं|महावीर ने लेश्या के आधार पर छह प्रकार के व्यक्तित्व की चर्चा की है|१.कृष्ण २.नील ३.कापोत ४.पीत५.पद्म ६.शुक्ल|यह लेश्यायें व्यक्ति की मानसिकता के आधार पर उसके आभामंडल का निर्माण करती हैं|इनमें से  १.कृष्ण २.नील ३.कापोत-ये तीन अशुभ लेश्यायें हैं और ४.पीत५.पद्म ६.शुक्ल-ये तीन शुभ लेश्यायें हैं|यह विषय रंग मनोविज्ञान का भी है| कृष्ण, नील , और कपोत --ये तीनों लेश्याएँ बदलती हैं; तब तेजस, पद्म और शुक्ल लेश्याओं का अवतरण होता है और यहीं से परिवर्तन का क्रम प्रारम्भ होता है। लेश्या परिवर्तन से ही अध्यात्म की यात्रा आगे बढ़ती है। लेश्या परिवर्तन से ही धर्म सिद्ध होता है। अध्यात्म की यात्रा का प्रारम्भ तेजस लाश्य से होता है। तेजस लेश्या का रंग लाल अर्थात बाल-सूर्य जैसा अरुण होता है। रंगों का मनोविज्ञान बताता है कि अध्यात्म कि यात्रा लाल रंग से ही शुरू होती है।
          जब व्यक्ति का चरित्र शुद्ध होता है, तब उसका संकल्प अपने आप फलित होता है। चरित्र की शुद्धि के आधार पर संकल्प की क्षमता जागती है। जिसका संकल्प बल जाग जाता है उसकी कोई भी कामना अधूरी नहीं रहती। संकल्प लेश्याओं को प्रभावित करते हैं। लेश्या का बहुत बड़ा सूत्र है चरित्र। तेजोलेश्या, पद्मलेश्या और शुक्ललेश्या ये तीन उज्ज्वल लेश्याएं हैं। इनके रंग चमकीले होते हैं। कृष्णलेश्या, नीललेश्या और कापोतलेश्या ये तीन अशुद्ध लेश्याएं हैं। इनके रंग अंधकार के रंग होते हैं। वे विकृत भाव पैदा करते हैं। वे रंग हमारे आभामंडल को धूमिल बनाते हैं। चमकते रंग आभामंडल में निर्मलता और उज्ज्वलता लाते हैं। वे आभामंडल की क्षमता बढ़ाते हैं। उनकी जो विद्युत चुंबकीय रश्मियां हैं वे बहुत शक्तिशाली बन जाती हैं।

इसी प्रकार चौदह गुणस्थान तथा बारह अनुप्रेक्षाओं के सन्दर्भ में भी व्यक्ति के आंतरिक और वाह्य व्यक्तित्व विकास की चर्चा भगवान महावीर ने की है |अहिंसा ,सत्य ,अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रहमचर्य ये पञ्च अणुव्रत भी एक संतुलित व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं| भगवान महावीर की यह स्पष्ट अवधारणा है कि हमारा व्यक्तित्व मात्र कपड़ो या शारीरिक सौंदर्य से ही निर्मित नहीं होता उसमें हमारा चिंतन,वाणी और व्यवहार तथा आध्यात्मिक दृष्टि भी महत्वपूर्ण घटक है जो हमारे सही और सम्पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करता है | यदि आज के युवा भगवान महावीर के इन सिद्धांतों को समझेंगे तो वे एक आध्यात्मिक –वैज्ञानिक व्यक्तित्व का निर्माण कर सकते हैं |
*Dr ANEKANT KUMAR JAIN Deptt.of Jainphilosophy,Sri Lalbahadur Shastri Rashtriya Sanskrit Vidyapeeth,Deemed
University Under Ministry of HRD
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