Monday, July 27, 2015

क्या आगम ही मात्र प्रमाण है ?

क्या आगम ही मात्र प्रमाण है ?
१.आगम प्रमाण है ,किन्तु मात्र वह ही प्रमाण नहीं है |जैन दर्शन में आगम अर्थात आप्त वचन को भी परोक्ष प्रमाण में पांचवां प्रमाण कहा है |उसके पूर्व स्मृति,प्रत्यभिज्ञान,तर्क,अनुमान भी परोक्ष प्रमाण के रूप में ही हैं |सबसे पहले प्रत्यक्ष प्रमाण और उसमें भी इन्द्रिय प्रत्यक्ष और अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष ये दो भेद भी किये हैं |ये सभी प्रमाण है |
२.आगम प्रमाण तो है ,लेकिन अनुमान और तर्क को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है |जब आगम है तो युक्ति और तर्क आदि की क्या आवश्यकता थी ?आचार्य जानते थे कि आज आगम भले ही भगवान् की वाणी हैं लेकिन कालांतर में छद्मस्थ मनुष्य ही इसे लिखेगा,बोलेगा ,और छपवाएगा |
३.और तब वह लिखने और बोलने में सबसे पहले मंगलाचरण में तो यही कहेगा कि जो भगवान् की वाणी में आया वह मैं कह रहा हूँ और अपने देश ,काल, वातावरण,संप्रदाय,और आग्रहों को भी भगवान् के नाम से अज्ञानता वश उसमें जड़ देगा |कभी कभी परिस्थिति वश धर्म रक्षा के लोभ में भी वह कई तरह के मिथ्यात्व कुछ अच्छे नामों से उसमें डाल देगा |तब बाद में आगम की कौन रक्षा करेगा ?कैसे पता चलेगा कि भगवान् की वाणी का मूल अभिप्राय क्या था ?
४.ऐसे मुश्किल वक्त में सत्य का निर्णय करने के लिए तर्क ,अनुमान प्रमाण काम आयेंगे |मात्र किताबें अंतिम ज्ञान नहीं हैं भले ही वह भगवान् की कही विज्ञापित की गयीं हों ||विवेक भी आवश्यक है | अन्यथा प्रत्यक्ष और आगम ये दो ही प्रमाण होते |
५.आज आवश्यक है कि श्रद्धा के साथ तर्क और युक्ति का प्रयोग अवश्य किया जाय |श्रद्धा के साथ तर्क और युक्ति का प्रयोग ही आगम की रक्षा करेगा और भगवान् ,आप्त और आगम के नाम पर हो रहे मिथ्या प्रतिपादनों पर अंकुश लगाएगा |
६.अनेकांत दर्शन में 'ही' हितकारी नहीं है ,इसलिए आगम भी प्रमाण है ,हम ऐसा ही कहेंगे |
-डॉ अनेकांत कुमार जैन, anekant76@gmail.com

Friday, July 17, 2015

प्रकृति एकांत वादी नहीं है

  प्रकृति एकांत वादी नहीं है

कुछ ,कभी भी ,सब कुछ नहीं हो सकता |प्रकृति संतुलन बैठाती रहती है |वह हमारी तरह भावुक और एकान्तवादी नहीं है |हम भावुकता में बहुत जल्दी जीवन के किसी एक पक्ष को सम्पूर्ण जीवन भले ही घोषित करते फिरें पर ऐसा होता नहीं हैं |

जैसे हम बहुत भावुकता में आदर्शवादी बन कर यह कह देते है कि
१.प्रेम ही जीवन है|
२.अहिंसा ही जीवन है |
३. जल ही जीवन है |
४.अध्यात्म ही जीवन है | आदि आदि

यथार्थ यह है कि ये चाहे कितने भी महत्वपूर्ण क्यूँ न हों किन्तु सब कुछ नहीं हैं |ये जीवन का एक अनिवार्य पक्ष ,सुन्दर पक्ष हो सकता है लेकिन चाहे कुछ भी हो सम्पूर्ण जीवन नहीं हो सकता |इसीलिए कायनात इन्साफ करती है क्यूँ कि हमारी तरह वह सत्य की बहुआयामिता का अपलाप नहीं कर सकती |

इसीलिए विश्व के इतिहास में दुनिया के किसी  भी धर्म को कायनात उसकी  कुछ एक विशेषताओं के कारण एक बार उसे छा जाने का मौका देती है किन्तु चाहे वे सम्पूर्ण सत्य दृष्टि का कितना भी दावा करें वे अन्ततोगत्वा ज्यादा से ज्यादा बहुभाग का एक हिस्सा बन कर रह जाते हैं ,उन की कुछ विशेषताओं के कारण एक कोना उन्हें नसीब तो हो जाता है लेकिन वे विराट रूप में छा नहीं पाते |कायनात जानती है कि ये भी सत्य के एक अंश का ढोल मात्र पीट रहे हैं |

जीवन शत प्रतिशत अध्यात्म वादी भी नहीं हो सकता |हाँ प्रतिशत कम ज्यादा हो सकता है |प्रेम की महत्ता भी कुछ है पर वह भी  सब कुछ नहीं है |अच्छा ही होगा ...यह भी एकांत मान्यता है |बुरा भी है ,उसका भी अस्तित्व है |यहबात अलग है कि यह हमें स्वीकार नहीं होता | हम और आप एकांतवादी हो सकते हैं ,वस्तु या प्रकृति तो अनेकांत स्वभाव वाली ही है | अच्छा है तो बुरा भी है |देव हैं तो राक्षस भी हैं |भ्रष्ट हैं तो ईमानदार भी हैं ,दुःख है तो सुख भी है |नित्य है तो अनित्यता भी है |

आश्चर्य यह है कि ये दोनों साथ रहते हैं और हम इन्हें विरोधी मानते हैं | प्रकृति कहती है कि ये विरोध प्रतीत होता है ...वस्तुतः है नहीं |ये एक दूसरे के अस्तित्व का कारण हैं  | जो हमारे अस्तित्व का कारण है उसे हम विरोधी कैसे मान  सकते हैं ? पता लगाइए हम जिसे अपना विरोधी माने  बैठे हैं और द्वेष वशात उसे समाप्त करना चाहते हैं कहीं सूक्ष्म रूप से वो हमारे अस्तित्व का कारण तो नहीं |उसे समाप्त करके कहीं हम अपने अस्तित्व को ही तो चुनौती तो नहीं दे रहे ?...कहीं हम अपने पैर पर ही तो कुल्हाड़ी नहीं मार रहे ? विरोध को स्वीकारना भी प्रकृति है |

अंशी होने के गुमान में हम अंश होकर ही रह जाते हैं ,अच्छा है जो प्रकृति अपना संतुलन बनाती रहती है |मंदिर ,मस्जिद ,गुरुद्वारा ,चर्च आदि सबको खाक बना देती है |हमें यह सोचने पर विवश करती है की जिनके लिए हम लड़ मर रहे हैं उनकी कीमत मिटटी के सिवा कुछ भी नहीं |ये सब हमने इसलिए मिटाया कि इनसे जो सीखना था वो तुम न सीख सके |मिथ्या अहंकार था ..टूट गया |अब किस बात पर लड़ोगे -झगडोगे ?इसीलिए अच्छा है जो दीवारें हम नहीं तोड़ सकते उन्हें प्रकृति स्वयं ढहा देती है |

               -डॉ अनेकांत

Saturday, July 11, 2015

"चातुर्मास में करें प्राकृत भाषा का विकास"

सादर प्रकाशनार्थ
"चातुर्मास में करें प्राकृत भाषा का विकास"
विश्व के प्रायःसभी धर्म ग्रन्थ किसी न किसी भाषा में लिखे गए हैं | भगवान् महावीर की दिव्यध्वनि में जो ज्ञान प्रकट हुआ वह मूल रूप से प्राकृत भाषा में संकलित हैं जिन्हें प्राकृत जैन आगम कहते हैं |इन दिनों जैन समाज में प्रायः सभी जगह साधु/साध्वियां चातुर्मास स्थापित कर रहे हैं |चातुर्मास में प्रत्येक जगह विशेष धर्म आराधना की जाती है तथा लोगों में विशेष उत्साह रहता है |वर्तमान में यह देखा जा रहा है कि हमारे मूल आगमों की भाषा प्राकृत को लोग जानते भी नहीं हैं तथा इसका परिचय भी नहीं है |इसीलिए हम अपने शास्त्र पढ़ नहीं पाते हैं |यह हमारा दुर्भाग्य है |इस वर्ष चातुर्मास में सभी साधू श्रावक विद्वान् आदि निम्नलिखित प्रयास करके समाज में प्राकृत भाषा को पुनः जीवंत कर सकते हैं -
१. अपनी सभाओं में प्रत्येक कार्यक्रम के पहले एक मंगलाचरण प्राकृत गाथाओं का अवश्य करें अथवा करवाएं |तथा उससे पूर्व सभा में यह घोषणा करें कि अब प्राकृत भाषा में मंगलाचरण होगा |हो सके तो उसका अर्थ भी बताएं |
२. चातुर्मास में एक हफ्ते का प्राकृत शिक्षण शिविर भी अवश्य रखें |
३. सामायिक तथा प्रतिक्रमण पाठ मूल प्राकृत में ही कराएँ ,भले ही बाद में हिंदी में अर्थ समझा दें |
४. अपने कुछ व्याख्यान प्राकृत भाषा के ऊपर दें |
५. प्राकृत भाषा की प्रेरक शुद्ध गाथा /सूक्ति आदि अर्थ सहित फ्लेक्स आदि पर छपवा कर मंदिर,स्थानक,पंडाल आदि प्रमुख स्थानों पर लगवाएं |
६. किसी एक प्राकृत पाण्डुलिपि का संपादन करें या करवाएं तथा उसे प्रकाशित करें |
७. देश में कई संस्थान ,विश्वविद्यालय आदि प्राकृत के नियमित /पत्राचार पाठ्यक्रम चलाते हैं |समाज में कुछ प्रतिभाशाली लोगों को वे कोर्स करने को प्रेरित करें |
८. यदि आप प्रभावशाली हैं तो जहाँ आपका चातुर्मास है वहां के विश्वविद्यालय में जैन विद्या और प्राकृत विभाग /अकादमी/शोध संस्थान स्थापित करवाने का प्रयास करें ताकि चातुर्मास की स्मृति अमर हो और महान उपलब्धि मानी जाय |
९. बातचीत और भाषण ,प्रवचन में प्राकृत के कई तकनीकी शब्दावलियों का प्रयोग अवश्य करें जैसे “नमोस्तु”के स्थान पर “णमोत्थु” आदि का प्रयोग प्रारंभ करें |
१०. निमंत्रण पत्रिकाओं में एक प्राकृत गाथा अर्थ सहित अवश्य प्रकाशित करवाएं |
इस तरह के और भी कार्य किये जा सकते हैं |हो सकता हम सभी का एक छोटा सा प्रयास भी कोई बड़ा काम कर दे |
निवेदक–डॉ अनेकांत कुमार जैन,नई दिल्ली ,anekant76@gmail.com;
ph. 09711397716

चातुर्मास से होती है आध्यात्मिक क्रांति


"Pravacansaar " - an ancient jain canonical prakrit text of philosophy .by Dr Anekant kumar Jain

"Pravacansaar " - an ancient jain canonical prakrit text of philosophy .by Dr Anekant kumar Jain (Published in Jain Journal,kolkata)

Pravchansaar is composed by Acharya Kundkund at 1st C.AD in Shaurseni Prakrit Language.This is an imp.literature of जैन ज्ञान योग  .This is in syllabus of P.G.classes in various Universities.






Wednesday, June 24, 2015

अंतर्राष्ट्रीय जुगाड़ दिवस भी मनाया जाय

"अंतर्राष्ट्रीय जुगाड़ दिवस भी मनाया जाय"

"अंतर्राष्ट्रीय जुगाड़ दिवस भी मनाया जाय" क्यों कि योग का एक देसी अर्थ "जुगाड़" भी है |

दर्शन - "जुगाड़"

आसन -
इसका एक ही सिद्ध आसन है - " चाटुकारासन " |
ये सब नहीं कर सकते |


कौन कर सकता है ?-


इसके साधक योगियों में धैर्य,समता,चेहरे पर कृत्रिम मुस्कान,अविद्यमान गुणों की भी प्रशंसा करना,रात को दिन कहने की कला ,चरण स्पर्श आदि में महारथ,मौसम को भांपने की क्षमता और उसी के अनुकूल खुद का भी रंग बदलने का हुनर,किसी एक सिद्धांत पर अडिग न रहने का साहस,खुद की हर क्रिया को सही और तर्क सम्मत सिद्ध करने का पांडित्य आदि आदि विशेष गुण होते हैं |इनके अभाव में इसकी साधना नहीं की जा सकती |इसके लिए रीड़ की हड्डी में विशेष लचीलापन चाहिए |
मंत्र-

व्यर्थ की प्रशंसा इसका मूल मंत्र है| काव्य कला हो तो अधिक असरकारी हो जाता है|
इसके लाभ -

१.व्यक्ति सत्ता परिवर्तन जैसे तनावों से मुक्त रहता है |

२.सरकार चाहे जिसकी हो उसका कभी ट्रान्सफर आदि नहीं होता |वह अपदस्थ नहीं होता |सहज ही बड़े बड़े पद और सुविधाएँ मिल जाती हैं |

३.कार्यक्षेत्र में योग्यता की न्यूनता होने पर भी पदोन्नति शीघ्र प्राप्त हो जाती है |वरीयता क्रम भी कोई मायने नहीं रखता |
४.रिश्वत आदि खर्चे के बिना भी काम हो जाते हैं |बचत होती है |

५.इसके माध्यम से बड़े बड़े संत महात्मा,मंत्री,अधिकारी,कुलपति,उद्योगपति आदि को कुछ ही दिनों की साधना के बाद आसानी से अपने वश में करके लाभ प्राप्त किया जा सकता है |

विशेषताएं -
१.यह सभी देशों में चलता है पर भारत हमेशा से विश्व गुरु है |

२.यह गैर सांप्रदायिक है |सभी धर्मों में,धर्म संस्थाओं में समान रूप से मान्यता प्राप्त है |

३.सभी राजनीतिक दलों को यह स्वीकार्य है |