Saturday, July 22, 2017

प्राकृत साहित्य में जीवन - डॉ अनेकांत कुमार जैन

प्राकृत साहित्य में जीवन

डॉ अनेकांत कुमार जैन

प्राकृत साहित्य अपने रूप एवं विषय की दृष्टि से बड़ा महत्वपूर्ण है तथा भारतीय संस्कृति और जीवन के सर्वांग परिशीलन के लिये उसका स्थान अद्वितीय है। उसमें उन लोकभाषाओं का प्रतिनिधित्व किया जाता है जिन्होंने वैदिक काल एवं संभवत: उससे भी पूर्वकाल से लेकर देश के नाना भागों को गंगा यमुना आदि महानदियों को प्लावित किया है और उसकी साहित्यभूमि को उर्वरा बनाया हैं। प्राकृत साहित्य अथाह सागर है | संसार की अन्य प्राचीन भाषाओँ के साहित्य और सम्पूर्ण प्राकृत साहित्य की तुलना की जाय तो संख्या,गुणवत्ता और प्रभाव की दृष्टि से प्राकृत साहित्य अधिक ही दिखाई देगा कम नहीं |प्राकृत साहित्य को हम मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त कर सकते हैं –
१.    आगम-दार्शनिक-साहित्य
२.    काव्य-कथा-तथा लैकिक साहित्य  
इसी प्रकार जीवन की अवधारणा को भी हम इन दो तरह के साहित्य में भिन्न भिन्न रूपों में देख सकते हैं |आगम-दार्शनिक साहित्य में भगवान् महावीर की वाणी ,आचार्यों द्वारा रचित जैन धर्म दर्शन सिद्धांत को निरूपित करने वाला साहित्य है जहाँ जीवन की परिभाषा करते हुए कहा है कि -
 ‘आउआदिपाणाणं धारणं जीवणं’ अर्थात् आयु आदि प्राणों का धारण करना जीवन है।[1] तथा
‘आउपमाणं जीविदं णाम’ अर्थात् आयु के प्रमाण का नाम जीवन (जीवित) है।[2] जीवन के पर्यायवाची बताते हुए कहा है कि जीवन पर्याय के ही स्थितिअविनाशअवस्थिति ऐसे नाम हैं।[3]
इसी प्रकार काव्य-कथा-तथा लौकिक साहित्य में मनुष्य के जीवन, जीवन मूल्य उसके सौंदर्य तथा विसंगतियों का बहुत ही मार्मिक चित्रण किया गया है | गाथासप्तशती जैसे ग्रन्थ में ग्राम्य जीवन की सहजता और विवशता का जो चित्रण है उससे बड़े बड़े काव्यशास्त्री भी मोहित हो उठे |
 एक साहित्यकार समाज की वास्तविक तस्वीर को सदैव अपने साहित्य में उतारता रहा है । मानव जीवन समाज का ही एक अंग है । मनुष्य परस्पर मिलकर समाज की रचना करते हैं । इस प्रकार समाज और मानव जीवन का संबंध भी अभिन्न है । समाज और जीवन दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं । साहित्य और जीवन का संबंध तो हमेशा से रहा है और जब तक जीवन हैतभी तक साहित्य है। आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने साहित्य और समाज के संबंध को इन शब्दों में व्यक्त किया है- साहित्य और जीवन का क्या संबंध है,यह प्रश्न आज एक विशेष प्रयोजन से पूछा जाता है। वर्तमान भारतीय समाज एक ऐसी अवस्था में पहुँच गया है जिसके आगे अज्ञात संभावनाएं छिपी हुई हैं। विशेषतः हमारे शिक्षित नवयुवकों के लिए यह क्रांति की घड़ी है।[4]
इस सम्भावना और क्रांति की खोज हम प्राकृत के विशाल साहित्य में कर सकते है | विवाह से पूर्व और विवाह के अनंतर पुत्र का जीवन कैसा हो गया इस पर एक पिता के कथन के माध्यम से जो कटाक्ष प्राकृत की इस गाथा में किया गया है उससे आपको प्राकृत की अद्भुत साहित्य संपदा का अंदाजा सहज ही हो जायेगा –
करिणीवेहव्व अरो मह पुत्तो एक्ककाण्डविणिवाई |
हअ सो हाए तह कहो जह कण्डकरण्डअं वरहई ||  (ध्वन्यालोक ३,४)

अर्थात् केवल एक वाण से हथिनियों को विधवा बना देने वाले मेरे पुत्र को उस अभागिनी पुत्रवधू ने ऐसा कमजोर बना दिया है कि अब वह केवल वाणों का तरकस लिए घूमता है |
   
इस प्रकार जीवन और साहित्य का अटूट संबंध है । साहित्यकार अपने जीवन में जो दु:खअवसादकटुतास्नेहप्रेमवात्सल्यदया आदि का अनुभव करता है उन्हीं अनुभवों को वह साहित्य में उतारता है ।इसके जीवंत उदाहरण प्राकृत साहित्य में पग पग पर देखने को मिलता है |




[1] आचार्य वीरसेन ,धवला पुस्तक १४/५,१६/१३/२ 
[2] आचार्य वीरसेन ,धवला पुस्तक १३/५,,६३/३३३/११ 
[3] जीवितं स्थितिरविनाशोऽवस्थितिरिति यावत् ।
       -आचार्य शिवार्य - भगवती आराधना /विजयोदय टीका /२५/८५/९ 
[4] हिन्दी साहित्य: रचना और विचारनन्द दुलारे वाजपेयीपृष्ट-20

Saturday, July 1, 2017

महाकवि आचार्य विद्यासागर की हाइकू का आध्यात्मिक सौंदर्य -डॉ अनेकांत कुमार जैन

महाकवि आचार्य विद्यासागर की हाइकू का आध्यात्मिक सौंदर्य
डॉ अनेकांत कुमार जैन
हाईकू मूलरूप से जापान की कविता है। "हाईकू का जन्म जापानी संस्कृति की परम्पराजापानी जनमानस और सौन्दर्य चेतना में हुआ और वहीं पला है। हाईकू में अनेक विचार-धाराएँ मिलती हैं- जैसे बौद्ध-धर्म (आदि रूपउसका चीनी और जापानी परिवर्तित रूपविशेष रूप से जेन सम्प्रदाय) चीनी दर्शन और प्राच्य-संस्कृति। यह भी कहा जा सकता है कि एक "हाईकू" में इन सब विचार-धाराओं की झाँकी मिल जाती है या "हाईकू" इन सबका दर्पण है।"हाईकू को काव्य विधा के रूप में बाशो (१६४४-१६९४) ने प्रतिष्ठा प्रदान की। हाईकू मात्सुओ बाशो के हाथों सँबरकर १७ वीं शताब्दी में जीवन के दर्शन से जुड़ कर जापानी कविता की युगधारा के रूप में प्रस्फुटित हुआ। आज हाईकू जापानी साहित्य की सीमाओं को लाँघकर विश्व साहित्य की निधि बन चुका है।1
हाइकू मात्र सत्रह मात्राओं में लिखी जाने वाली कविता है और अब तक की सबसे सूक्ष्म काव्य है और साथ ही सारगर्भित भी | हाइकू की लोकप्रियता व सारगर्भिता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज दुनिया कि हर भाषा में हाइकू लिखे जा रहे हैं | कुछ हिंदी विद्वान हाइकू काव्य को विदेशी बताकर आलोचना भी करते हैं पर साहित्य को किसी भाषाक्षेत्र या तकनीक की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता | बल्कि मैं तो यह कहूँगा की जिस प्रकार मारुति कारजापानी होकर भी छोटी होने के कारण हमारे यहाँ आम आदमी तक पहुँच बना ली उसी प्रकार हाइकू भी आम आदमी तक बड़ी सरलता से पहुँच सकता है | क्योंकि इसमे आम और साधारण बातों को ही जो प्रकृति और हमारे जीवन से जुडी होती हैंसुन्दर और विशेष विधि से कम से कम यानी सत्रह अक्षरों में कह दिया जाता है |
हाइकू लिखना गहरी सोचअध्ययन व अभ्यास का परिणाम होता है | हाइकू लिखने वाला कोई भी अपने को पूर्ण रूप से पारंगत नहीं कह सकता |अपनी कला के कारण हाइकू एक अपूर्ण कविता होते हुए भी पूरा भाव देने में सक्षम होता है | हाइकू ऐसी चतुराई से कहा जाता है कि पाठक अथवा श्रोता अपने ज्ञान व विवेक का प्रयोग करते हुए उसके भाव या उद्देश्य को पूर्ण कर लेता है | चूकि पाठक हाइकू को पढने के लिए उसमे पूर्ण रूप से घुसना पड़ता हैवह उसे अपने से जुड़ा व आनंदित अनुभव करता है | हाइकू में किन्ही दो भावविचारबिम्ब या परिदृश्य को मात्र १७ वर्णों में तीन पंक्तियों में दो या अधिक वाक्यांशों में इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है ताकि प्रथम व अंतिम पंक्ति में ५-५ वर्ण व दूसरी पंक्ति में ७ वर्ण हों | दोनों भावोंविचारों या दृश्यों को तुलनात्मक रूप से इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है की वे पृथक पृथक होते हुए भी परस्पर सम्बंधित हों | हाइकू की तीन पंक्तियाँ भावात्मक दृष्टि से दो खण्डों में विभाजित होती है | एक साधारण खंड तथा दूसरा विशेष खंड |
साधारण खंड में विषय वस्तु की आधारभूत भावबिम्बदृश्य या विचार रखी जाती है तथा विशेष खंड में उससे सम्बंधित विस्मित करने वाला विशेष तत्व | दोनों खंड पृथक होते हुए भी परस्पर पूरक होते हैं | दोनों खंड व्याकरण की दृष्टि से स्वतंत्र होने चाहिए | अपनी कविता १७ वर्णों में तीन पंक्तियों में लिख देने से हाइकू नहीं बन जाता बल्कि अच्छे हाइकू की विशेषता है उसमे पाठक को चौकाने वाला तत्व |यहाँ यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी की हाइकू में साधारण बात को ही असाधारण तरीके से कही जाती है | हाइकू एक वाक्य का नहीं होता| हाइकू में लयविरामपूर्ण विराम आदि चिन्हों की आवश्यकता नहीं होती | हाइकू मूलतः प्रकृति विषयों पर लिखे जाते हैं पर आजकल जीवन संबधी विषयों पर भी हाइकू बढ़ चढ़ कर लिखे जा रहे हैं | जीवन व ईश्वरीय विषयों पर लिखे हाइकू को अंग्रेजी में सेनर्यू कहा जाता है | वैसे हाइकू और सेनर्यू में विषय के अतिरिक्त और कोई अंतर नहीं है |
तीन पंक्तियों में से दो विषय वस्तु एवं उसके आधारभूत भाव या व्यवहार को दर्शाता है तथा तीसरी विशेष पंक्ति 
जिसमे उससे सम्बंधित विस्मयकारी भाव होता है |3
हाइकू के सन्दर्भ में स्वयं महाकवि आचार्य विद्यासागर जी का मंतव्य है –
हाई कू कृति
तिपाई सी अर्थ को
ऊँचा उठाती
।४३|
दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज इन दिनों (Japanese Haiku, 俳句 ) जापानी हायकू (कविता) की रचना कर रहे हैं  | हाइकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में अक्षरदूसरी पंक्ति में अक्षरतीसरी पंक्ति में अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। महाकवि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने लगभग 500 हायकू लिखे हैंजो अप्रकाशित हैं।किन्तु ये अद्भुत रचना मुझे http://www |vidyasagar |net/hayaku-nov-16/ लिंक पर अनायास ही पढने को मिल गयी  |
आचार्य श्री की हाइकू अन्य रचनाकारों की हाइकू से बिल्कुल ही पृथक नज़र आई | उसका बहुत बड़ा कारण है उनका संयममय जीवन | उनकी अनुभूतियों से निष्पन्न जापानी छंद हाइकू की ये रचनाएँ उन्हें विश्व के एक विशाल पटल पर स्थापित करती हैं | ये रचनाएँ एक नज़र में देखने में छोटी जरूर लगती हैं किन्तु कम शब्दों में इतने गहरे आध्यात्मिक भावों को लिए हुए हैं कि उनकी व्याख्या के लिए शब्द कम पढ़ जाते हैं एक बानगी देखिये –
संदेह होगा,
देह है तो देहाती !
विदेह हो जा
|२|
यहाँ ‘देह’ शब्द का जबरजस्त प्रयोग है | प्रथम पंक्ति है - संदेह होगा - अर्थात्....मिथ्यात्व होगा ,भ्रम होगा ,संशय होगा कि यह देह मेरी है ,या यह देह ही मैं हूँ ,संसार में तो ये सब होता ही रहेगा |द्वितीय पंक्ति है – देह है तो देहाती – अर्थात् देह जब तक रहेगी तब तक संसारी ही रहेगा |देहाती शब्द मूर्ख और गंवार के लिए भी जगत में विख्यात है | यहाँ आधार और आधेय भाव भी परिलक्षित है | देहात  में रहने वाला देहाती कहलाता है जैसे शहर में रहने वाला शहरी | साहित्य में ग्रामीण व्यक्ति प्रायः अज्ञानी की तरह अभिव्यंजित किया जाता रहा है ,यही अर्थ देहाती का भी है |लेकिन देहाती का आधार देह बताने की जबरजस्त अभिव्यंजना यहाँ कवि ने की है | इस कविता के सिर्फ साहित्यिक अर्थ नहीं निकाले जा सकते | अध्यात्म भी समझना जरूरी है | यहाँ भाव स्पष्ट दिख रहा है कि देहाती अर्थात अज्ञानी वह नहीं जो देहात में रहता है बल्कि वह है जो देह में आसक्त रहता है |देह में आसक्त आत्मा को देहाती अर्थात अज्ञानी कहा है |तीसरी पंक्ति है - विदेह हो जा – अर्थातआत्मकल्याण के लिए या इस संसार रुपी दुःख से ऊपर उठने के लिए जरूरी है शरीर से आसक्ति का त्याग ..विदेह होना | विदेह होने का दूसरा अर्थ है बिना देह के होना अर्थात सिद्ध होना | हाइकू की इन तीन पंक्तियों में संसार का कारण और उससे मुक्ति का उपाय सीधा समझा दिया |
अध्यात्म में दार्शनिक बोध बहुत आवश्यक होता है |उसके बिना उसका धरातल ही निर्मित नहीं होता | कर्मों के रूप में जन्म जन्मान्तरों के संस्कार इस आत्मा के साथ जुड़े हुए होते हैं | आत्मा के साथ बहुत कुछ आया पर वो कम आया जो काम का था |आत्मा ने पर को खूब जाना ...वे ज्ञेय तो चिपकते गए ...किन्तु सम्यक्ज्ञान नहीं चिपका , अन्यथा इस भव में पूर्व का स्मरण हो जाता |दुनिया को जाना पर जो दुनिया को जानता है ऐसा ज्ञायक स्वाभावी आत्मा को नहीं जाना ,ऐसा होता तो कल्याण हो जाता -
ज्ञेय चिपके
ज्ञान चिपकता तो
स्मृति हो आती
।२६|
महाकवि प्रदर्शन के बहुत खिलाफ नज़र आते हैं,उन्हें वो कोई भी कार्य नहीं भाता जिसमें निज आत्मा का प्रकाश न हो ....
निजी प्रकाश
किसी प्रकाशन में
क्या कभी दिखा ?
|४९|
इसी प्रकार की तड़फ अन्यत्र भी भरी पड़ी है ,एक और छंद है 
प्रदर्शन तो
उथला है दर्शन
गहराता है
|३३|
वे प्रश्न ,तर्क आदि से परे उस परम तत्त्व की तलाश में हैं जहाँ किसी उत्तर की आवश्यकता नहीं होती –
प्रश्नों से परे
 अनुत्तर है उन्हें
 मेरा नमन
|39|
उन्हें अपना ध्येय अन्दर ही दिखाई देता ...बाहर उसकी सम्भावना कम दिखाई देती है .....
मोक्षमार्ग तो
 भीतर अधिक है
बाहर कम
|६१‍ |
अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता का उनका हाइकू अंदाज भी निराला है ..
गुरू ने मुझे
प्रगट कर दिया
दिया दे दिया
|४७|
स्वानुभव को लेकर उनका चिंतन बड़ा गहरा और गंभीर है –
स्वानुभव की
समीक्षा पर करे
तो आँखें सुने
।७६|
स्वानुभव की
 प्रतीक्षा स्व करे तो
 कान देखता
।७७|
इस प्रकार हम देखते हैं कि महाकवि आचार्य विद्यासागर जी की हाइकू रचनाएँ गहरे अध्यात्म से भरी हैं |उन्होंने अनेक हाइकू जीवन मूल्यों और उनसे जुड़ीं विसंगतियों पर भी लिखे हैं किन्तु उन सभी में उनके मूल अध्यात्म की सुगंध ही महकती है , वे संसार की बात भी करते हैं किन्तु अध्यात्म के परिप्रेक्ष्य में | उनके प्रत्येक छंद के अनेक अर्थ निकाले जा सकते हैं | हमने यहाँ नमूनों के तौर पर कुछ छंद ही चयनित किये हैं ,सभी छंदों की मीमांसा की जाए तो पूरा एक शोध ग्रन्थ लिखा जा सकता है | अंत में परम योगी पूज्य १०८ आचार्य विद्यासागर महाराज जी के संयम स्वर्ण महोत्सव (आषाढ़ शुक्ला पंचमी ) पर मैं भी अपने जीवन का प्रथम ‘हाइकू’ समर्पित करके विराम लेता हूँ -
                                                       विद्यासागर
             अनुभव  गागर
                  नमन तुम्हें
                                                         -कुमार अनेकांत

संपर्क - डॉअनेकांत कुमार जैन,सह आचार्य एवं अध्यक्ष जैन दर्शन ,दर्शन संकाय ,श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ,(मानव संसाधन विकास मंत्रालयाधीन मानितविश्वविद्यालय),क़ुतुबसंस्थानिकक्षेत्रनईदिल्ली-११००१६,फ़ोन ९७११३९७७१६,anekanr76@gmail.com 



1. https://hi |wikipedia |org/wiki/ हाइकू retrieved on 27/06/2017 
2. S .. Tiwari article ,  https://www |poemhunter |com/poem/aao-seekhen-haiku/

28 जून आचार्य विद्यासागर महाराज जी के 50 वें संयमवर्ष पर विशेष- *महायोगी का जीवन ही उनका दर्शन है*

28 जून आचार्य विद्यासागर महाराज जी के 50 वें संयमवर्ष पर विशेष 

*महायोगी का जीवन ही उनका दर्शन है*

*डॉ अनेकांत कुमार जैन* नई दिल्ली 

 जीवन में हम बहुत कुछ सीखते हैं ,कई तरह से सीखते हैं ,किताबें पढ़ कर सीखते हैं तो कभी किसी से सुनकर सीखते हैं ,कुछ अपने अनुभव से सीखते हैं तो कुछ दूसरों के अनुभव से सीखते हैं | फिर हम सिखाने भी लग जाते हैं ,लगभग वही जो हमने सीखा है | इन सीखने सिखाने के सिलसिलों में हमारी उम्र कितनी गुजर जाती है पता ही नहीं चलता | उम्र के एक पड़ाव पर कभी फुरसत के क्षणों में यह लेखा जोखा करने बैठते हैं कि मैंने जो कुछ भी जीवन भर सीखा-सिखाया उसमें कितना प्रेयस था और कितना श्रेयस ? हमारे  आत्मकल्याण में ,आत्मशांति की प्राप्ति में वह सीख कितनी कार्यकारी है ? तो अक्सर हिसाब संतुलित नहीं बैठता | प्रेयस का पड़ला भारी नजर आता है , श्रेयस का बजन बहुत हल्का नजर आता है | दुःख होता है कि महाभाग्य से इतना दुर्लभ मनुष्य भव पा करके भी आत्मज्ञान के अभाव में हमारा सारा का सारा बौद्धिक विकास कितना रीता रीता सा लग रहा है ?

जानने का स्वभाव होते हुए भी हम उसे नहीं जान पाए जो जाननहार है ,ज्ञायक है | इसलिए मेरी अभी तक की सारी शिक्षा संसार बढाने वाली होने से  भार स्वरुप ही है | उस बौद्धिक विकास से हमारी आर्थिक स्थिति तो सुधरी लेकिन मानसिक स्थिति खराब हो गयी और हम उस सुधरी हुई आर्थिक स्थिति का भी आनंद नहीं ले पाए | हमारे दुःख कम होने की जगह बढ़ गए |

कविवर दौलतराम जी छहढाला के शुरू में ही लिखते हैं -

*जे त्रिभुवन में जीव अनंत , सुख चाहें दुःख ते भयवन्त |*

*तातें दुखहारी सुखकार, कहें सीख गुरु करुणा धार ||*

सीख अर्थात् शिक्षा |  स्वयम् साक्षात् मोक्षमार्ग पर चलने वाले आचार्य हमारे ऊपर करुणा करके हमें कौन सी शिक्षा देना चाहते हैं ? हमें ऐसा क्या सिखाना चाहते हैं जो सब कुछ सीखने के बाद भी हम सीख नहीं पाए ? और वो कैसे सिखायेंगे ? 

वे हमें सब कुछ सिखाते हैं ,कुछ कह कर सिखाते हैं ,बहुत कुछ बिना कहे ,कुछ करके सिखाते हैं ,बहुत कुछ बिना करे , उनका पूरा जीवन एक पाठशाला होता है ,योग्य शिष्य उनके जीवन की प्रत्येक  क्रिया एवं चर्या से , हर वाक्य से ,उनके हर पल से महाविद्या तक सीख लेता है |

हम सभी के ऐसे ही परम गुरु, भारत की पवित्र धरा पर पिछले पचास वर्षों से वीतरागी नग्न दिगम्बर उन्मुक्त विचरण करने वाले ,परम तपस्वी , स्वानुभवी आचार्य विद्यासागर जी महाराज हैं जिन्होंने स्वयं के कल्याण के साथ साथ हम जैसे जीवों के कल्याण के लिए शाश्वत मोक्षमार्ग की शिक्षा देकर हम सभी का परम उपकार किया है | संयम और ज्ञान की चलती फिरती महापाठशाळा के आप  ऐसे अनोखे  आचार्य हैं जो न सिर्फ कवि,साहित्यकार और विभिन्न भाषायों के वेत्ता हैं बल्कि न्याय,दर्शन ,अध्यात्म और सिद्धांत के महापंडित भी हैं ,ज्ञान के क्षेत्र में जितने ऊँचे हैं ,उससे कहीं अधिक ऊँचे वैराग्य ,तप,संयम की आराधना में हैं | ऐसा मणि-कांचन संयोग सभी में सहज प्राप्त नहीं होता |

विद्यासागर सिर्फ उनका नाम नहीं है यह उनका जीवन है ,वे चलते फिरते पूरे एक विशाल विश्वविद्यालय हैं , वे संयम , तप, वैराग्य , ज्ञान विज्ञान की एक ऐसी नदी हैं जो हज़ारों लोगों की प्यास बुझा रहे हैं , कितने ही भव्य जीव इस नदी में तैरना और तिरना दोनों सीख रहे हैं |

कितने ही उन्हें पढ़कर जानते हैं ,कितने ही उन्हें सुनकर जानते हैं ,कितने ही उन्हें देख कर जानते हैं और न जाने ऐसे कितने लोग हैं जो उन्हें जीने की कोशिश करके उन्हें जानने का प्रयास कर रहे हैं |

 इन सबके बाद भी आज बहुत से लोग ऐसे हैं जो कुछ नया जानना चाहते हैं , जीवन दर्शन को समझना चाहते हैं और जीवन के कल्याण की सच्ची विद्या सीखना चाहते हैं उन्हें इस सदी के महायोगी दिगम्बर जैन आचार्य  विद्यासागर महाराज के एक बार दर्शन अवश्य करना चाहिए ।

Tuesday, April 4, 2017

स्वच्छता और शुद्धता अभियान - दैनिक जागरण ४/४/२०१७


महावीर जयंती पर विशेष - 'भगवान् महावीर का स्वच्छता और शुद्धता अभियान'- डॉ अनेकांत कुमार जैन

चैत्र शुक्ल त्रयोदशी  ९ अप्रैल २०१७ को महावीर जयंती पर विशेष 

भगवान् महावीर का स्वच्छता और शुद्धता अभियान
डॉ अनेकांत कुमार जैन*
वर्तमान में स्वच्छ भारत अभियान आन्दोलन से स्वच्छता ने हमारी भारतीय संस्कृति  के गौरव को पुनः स्थापित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है  | भारतीय समाज में इसी तरह का स्वच्छता अभियान भगवान् महावीर ने ईसा की छठी शताब्दी पूर्व  चलाया  था  | उस अभियान को हम शुद्धता का अभियान कह सकते हैं  | भगवान् महावीर ने दो तरह की शुद्धता की बात कही -1. अन्तरंग शुद्धता 2. बहिरंग शुद्धता  | क्रोध, मान, माया,लोभ ये चार कषाये हैं  | ये आत्मा का मल-कचड़ा  है  | भगवान् महावीर ने मनुष्य में सबसे पहली आवश्यकता इस आंतरिक कचड़े को दूर करने की बतायी | उनका स्पष्ट मानना था की यदि क्रोध, मान, माया, लोभ और इसी तरह की अन्य हिंसा का भाव आत्मा में हैं तो वह अशुद्ध है और ऐसी अवस्था में बाहर से चाहे कितना भी नहाया-धोया जाय, साफ़ कपडे पहने जायें वे सब व्यर्थ हैं, क्यों कि किसी पशु की बलि देने से पहले उसे भी नहलाया-धुलाया जाता है, पुजारी भी नहाता है और उस पशु की पूजा करता है  |
            भगवान् माहावीर का मानना था की उस निर्दोष प्राणी के जीवन को समाप्त करने का और प्रसाद में उसके रक्त और मांस सेवन का अभिप्राय तुम्हारे मन में है तो ऐसे पापी का नहाना-धोना,स्वच्छता आदि सब पाखण्ड हैं, अधर्म है | समाज में हिंसा हर जगह होती है  | उसके अहिंसक समाधान भी धैर्य पूर्वक खोजे जा सकते हैं किन्तु जब धर्म के नाम पर ही हिंसा होने लगे तो इससे बड़ी सामाजिक गन्दगी कुछ नहीं हो सकती  |उन्होंने समाज से इस प्रकार की गन्दगी को हटाने का संसार का सबसे बड़ा ‘स्वच्छता-अभियान’ प्रारंभ किया |
            भारत में पवित्र वैदिक संस्कृति को यज्ञादि में पशु बलि प्रथा ने विकृत कर रखा था  | भगवान् महावीर से पूर्व तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने राजकुमार अवस्था में एक तापस ऋषि को यज्ञ के लिए लकड़ी जलने से यह कहकर मना किया कि इसके भीतर एक सर्पयुगल रहता है | मना करने के बाद भी ऋषि ने क्रोध में वह लकड़ी जलाई और काफी अनुरोध पर जब लकड़ी चीरकर देखी गयी तो उसमें झुलसे हुए सर्प युगल निकले और उनका प्राणांत हो गया  | उसके बाद भगवान् महावीर ने भारतीय समाज में फैली तमाम बुराईयों को दूर करने का प्रयास किया  | भगवान् महावीर के अभियान का यदि हम अभिप्राय समझें तो यह अभिव्यक्त होता है कि ‘शुद्धता’ एक व्यापक दृष्टिकोण है जिसका एक अंग है ‘स्वच्छता’ |
            अगर आपके भीतर जीवों के प्रति मैत्री, करुणा, दया या अहिंसा का भाव नहीं है और आप बाहरी साफ़-सफाई सिर्फ इसलिए करते हैं कि स्वयं आपको रोग न हो जाये तो यह ‘स्वच्छता’ है किन्तु इस क्रिया में आप साफ़-सफाई इसलिए भी करते हैं कि दूसरे जीवों को भी कष्ट न हो, सभी स्वस्थ रहें, जीवित रहें तो अहिंसा का अभिप्राय मुख्य होने से वह ‘शुद्धता’ की कोटि में आता है |
जैन साधु हमेशा मयूर पंख की एक पिच्छी साथ में रखते हैं | किसलिए? जब वे चलते हैं, बैठते हैं, या कोई ग्रन्थ आदि कहीं पर रखते हैं तो पहले मयूर पिच्छी से उस स्थान को एक बार बुहार लेते हैं | जगह की सफाई करके ही वहां बैठते हैं | सामान्य जन को एक बार लगेगा कि यह मयूर पिच्छी, साफ़-सफाई का उपकरण (झाडू) है; लेकिन जैन आगमों में इसे ‘संयम का उपकरण’ कहा है | कार्य सफाई का है लेकिन उद्देश्य यह है कि यदि बिना साफ किए वहाँ बैठ जायेंगे तो वहाँ दृश्य-अदृश्य, स्थूल, सूक्ष्म जीवों को वेदना हो सकती है, उनका प्राणांत हो सकता है अतः मयूर पंख की पिच्छी से विनम्रता पूर्वक उन्हें वहाँ से अलग कर दें तो हिंसा नहीं होगी |अब इस कार्य के लिए झाडू भी रखी जा सकती थी; किन्तु मयूर पंख की अत्यंत कोमलता के कारण ही पिच्छी को चुना गया | मयूर पिच्छी से जब सूक्ष्म जीवों को भी वहाँ से हटाया जाता है तो उसकी कोमलता से उन्हें बहुत अल्प कष्ट ही होता है |भगवान् की अत्यंत करुणा से युक्त ऐसा अभियान ‘शुद्धता’ का था जिसमें स्वच्छता तो स्वभाव से गर्भित रहती ही है |वे सच्चे साधु के लिए मठ-आश्रम बनाने के भी खिलाफ थे | उनका मानना था कि जब-जब साधुओं ने मठ व आश्रम बनाये हैं, तब तब वे संसार में फंसे हैं | मठों-आश्रमों को अनाचार का केंद्र बनते देर नहीं लगती |
भगवान् महावीर के प्रथम शिष्य गौतम गणधर ने हर बात पर अहिंसा-अहिंसा सुनकर एक बार उनसे पूछा हे भगवन्-
‘कहं चरे कहं चिट्ठे कहमासे कहं सए  |
कहं भुंजतो मासंतो पावं कम्मं न बंधई 
 | |
          अर्थात् कैसे चलें? कैसे खड़े हों? कैसे बैठे? कैसे सोएं? कैसे खाएं? कैसे बोलें? जिससे पापकर्म का बंधन न हो | तब इस प्रश्न का समाधान करते हुए एक बार भगवान् महावीर ने कहा-
‘जयं चरे जयं चिट्ठे जयमासे जयं सए  |
जयं भुंजन्तो भाजन्तो पावकम्मं न बंधई 
 | |
          अर्थात् सावधानीपूर्वक चलो, सावधानीपूर्वक खड़े हो, सावधानीपूर्वक बैठो, सावधानीपूर्वक सोओ, सावधानीपूर्वक खाओ और सावधानी से वाणी बोलो तो पाप कर्म बंधन नहीं होता |कहने का तात्पर्य क्रिया का निषेध नहीं है बल्कि हर किया के साथ यात्नाचार सम्मिलित हो- यह अपेक्षा है | आप अपनी हर क्रिया में इतनी सावधानी रखें कि दूसरे जीवों की विराधना न हो, कष्ट न हो तो उस क्रिया में पाप बंध नहीं होगा |
            आज भी जैन मुनि यत्र-तत्र कहीं भी आहार नहीं लेते | गृहस्थ लोग अपने चौके (रसोई) को पहले पूर्णतः शुद्ध करते हैं, उस दिन वे शास्त्रीय पद्धति से शुद्ध आहार का निर्माण करते हैं तथा स्वयं ग्रहण करने से पहले पूर्व किन्हीं मुनिराज को आहार हेतु निमंत्रित करते हैं, मुनिराज भी पहले उससे संकल्प करवाते हैं कि ‘मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काय शुद्धि आहार जल शुद्ध है,’ तभी वे उसके यहाँ मात्र एक समय पाणी-पात्र में खड़े होकर थोड़ा सा आहार ग्रहण करते हैं |इसी बीच यदि कहीं भी कोई साफ़-सफाई में अशुद्धाता उन्हें दिखाई दे जाये तो उसे वे अंतराय (विघ्न) जानकार आहार त्याग कर देते हैं |
            जैनधर्म में अहिंसा पर अत्यधिक बल दिया गया है; किन्तु गृहस्थ जीवन में कुछ हिंसाएं न चाहते हुए भी हो जाती हैं अतः कहा गया है कि गृहस्थ व्यक्ति ‘आरंभी हिंसा’ का पूर्ण त्यागी नहीं होता | यह आरंभी हिंसा वही है जो घर-मोहल्ले की साफ़-सफाई, झाडू, बुहारी इत्यादि कार्यों में हो जाती हैं, एक गृहस्थ व्यक्ति को साफ़-सफाई रखना ही चाहिए यह उसका परम कर्तव्य है, धर्म है, बस इतना जरूर कहा गया है कि वह इस साफ-सफाई में भी हिंसा की अल्पता रखे और प्रयास करे कि जीवों को कम से कम कष्ट हो | पहले वह अहिंसक उपायों से ही स्वच्छता रखने का अधिक प्रयास करे  | अहिंसा का विवेक साथ में रहेगा तो ‘स्वच्छता’ ‘शुद्धता’ द्वारा अलंकृत हो जायेगी | 
                                                                                                                 
*अध्यक्ष जैनदर्शन,दर्शन संकाय
श्री लालबहादुरशास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ
नई दिल्ली-११००१६
०९७११३९७७१६
 (यह आलेख ४ /४/२०१७ को दैनिक जागरण में प्रकाशित है )

Sunday, March 12, 2017

भगवान् महावीर की उदार दृष्टि - डॉ अनेकांत कुमार जैन

भगवान् महावीर की उदार दृष्टि
(c)डॉ अनेकांत कुमार जैन
भगवान् महावीर के उपदेशों में सभी जीवों के प्रति करुणाभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है |आचरण में अहिंसा, विचारों में अनेकांत,वाणी में स्याद्वाद और जीवन में अपरिग्रह –इस प्रकार का चिंतन ही एक स्वस्थ्य व्यक्ति और शांतिपूर्ण समाज के लक्ष्य को पूरा कर सकता है | जैन धर्म दर्शन संस्कृति साहित्य और समाज इसी उदारवादी विचारधारा के कारण अनंतकाल पूर्व से आज तक समृद्ध रूप से विद्यमान है |
भगवान् महावीर ने जो ज्ञान समाज के कल्याण के लिए दिया उसका एक विशाल साहित्य प्राकृत आगमों के रूप में हमें उपलब्ध होता है जिसे द्वादशांग कहते हैं | जैन आचार्य परंपरा ने उनकी वाणी के हार्द को प्राकृत,संस्कृत,अपभ्रंश,हिंदी,कन्नड़,तमिल आदि अनेक भाषाओँ में , अनेक विधाओं में तथा अनेक विषयों पर लाखों की संख्या में साहित्य की सर्जना करके प्रत्येक भाषा के साहित्य को तो समृद्ध किया ही साथ ही तत्वज्ञान और समाज कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त किया | साहित्य को कभी सीमा में नहीं बाँधा जा सकता यही कारण है कि जैन साहित्य में उदार तथा समन्वयवादी स्वर भी मुखरित हुआ | ह्रदय की उदारता के बिना लेखनी में उदारता संभव नहीं है अतः यहाँ हम देखेंगे कि वह कौन से तत्त्व हैं जो जैन परंपरा के हृदय की उदारता को बयाँ करते हैं |
हम समाज में रहते हैं और उस समाज में रहते हैं जहां जरूरी नहीं कि हमारे धर्म,दर्शन या मान्यता वाले ही हमारे साथ रहते हों | भिन्न तथा विपरीत मत वालों के बीच भी हम अपने धर्म,मर्यादा और सिद्धांतों से समझौता किये बिना किस सहिष्णुता ,सौहार्द ,समन्वय और सह-अस्तित्व की भावना के साथ रहें-इसकी कला भगवान् महावीर और उनकी आचार्य परंपरा ने हमें सिखलाई है |
विरोधी विचारों और मान्यताओं के अस्तित्व को स्वीकारते हुए हमें उनसे व्यर्थ का वाद-विवाद नहीं करना चाहिए | आचार्य कुन्दकुन्द अपने नियमसार ग्रन्थ में कहते हैं -
णाणा जीवा णाणा कम्मं णाणाविहं हवे लद्धी |
तम्हा वयण-विवादं , सग-पर-समएहि वज्जेज्जो ||[1]
अर्थात् जीव नाना प्रकार के हैं ,कर्म नाना प्रकार के हैं ,और लाब्धियाँ भी नाना प्रकार की हैं |इसलिए साधार्मियों और पर धर्मियों के साथ वचन विवाद छोड़ देना चाहिए |
परमात्मा कौन है ? कैसा है ,इस विषय पर बहुत मतभेद रहते हैं | आचार्य कुन्दकुन्द भाव पाहुड में एक ही गाथा में सभी का समन्वय एक ज्ञानी के अंतर्गत करके बहुत सुन्दर कहते हैं –
णाणी सिव परमेट्ठी सव्वण्हू विण्हू चउमुहो बुद्धो ।
अप्पो वि य परमप्पो कम्मविमुक्को य होइ फुडं ।।[2]
अर्थात् परमात्मा ज्ञानी है, शिव है, परमेष्ठी है, सर्वज्ञ है, विष्णु है, चर्तुमुखब्रह्मा है, बुद्ध है, आत्मा है, परमात्मा है और कर्मरहित है, यह स्पष्ट जानो ।
जैन आचार्यों ने यह माना है कि धर्म की शुरुआत आत्म प्रतीति रूप सम्यग्दर्शन से होती है | लेकिन क्या वह सम्यग्दर्शन सभी लोगों को हो सकता है ?  इस धर्म की अधिकारी कोई जाति विशेष तो नहीं है ? आचार्य समन्तभद्र स्वामी (२-३ शती )इस श्लोक के माध्यम से यह बतलाना चाह रहे हैं कि धर्म के अधिकारी सभी लोग होते हैं -
सम्यग्दर्शनसम्पन्नमपिमातङ्‍गदेहजम्।
देवा देवं विदुर्भस्मगूढाङ्‍गारान्तरौजसम् ॥[3]
अर्थात्गणधरादिक देव, चाण्डाल कुल में उत्पन्न हुए भी सम्यग्दर्शन से युक्त जीव को भस्म से आच्छादित अंगारे के भीतरी भाग के समान तेज से युक्त आदरणीय जानते हैं।
आचार्य प्रभाचंद्र (११ शती )इस श्लोक की संस्कृत टीका करते हुए कहते हैं कि चाण्डाल कुल में उत्पन्न होने पर भी यदि कोई पुरुष सम्यग्दर्शन से सम्पन्न है तो वह आदर सत्कार के योग्य है, ऐसा गणधरादिक देव कहते हैं। क्योंकि जिसका मन सदा धर्म में लगा रहता है उसे देव भी नमस्कार करते हैं, ऐसा कहा गया है। अतएव ऐसे व्यक्ति का तेज भस्म से प्रच्छादित अंगारे के भीतरी तेज के समान निर्मलता से युक्त है।[4]
हम धर्म की आराधना करें यह ठीक है किन्तु दुरभिमान में कभी कभी अन्य सधर्मियों का अपमान भी कर देते हैं |आचार्य समन्तभद्र इसका कड़ा निषेध करते हैं और उनका मानना है कि जो धर्म की आरधना करने वाले अन्य अनुयायियों का अपमान करता है वह दरअसल धर्म का अपमान करता है -
स्मयेन योऽन्यानत्येति धर्मस्थान् गर्विताशयः ।
सोऽत्येति धर्ममात्मीयं, न धर्मो धार्मिकैर्विना ॥ [5]
अर्थात् मद से गर्वित चित्त होता हुआ जो पुरुष धर्म में स्थित अन्य जीवों को तिरस्कृत करता है, वह अपने धर्म को तिरस्कृत करता है, क्योंकि धर्मात्माओं के बिना धर्म नहीं होता।
आजकल धर्म दर्शन के क्षेत्र में एक बिडम्बना यह चल पड़ी है कि चूँकि हमारे अतिरिक्त अन्य धर्म मिथ्या होते हैं अतः अन्य धर्म दर्शनों के ग्रंथों का अध्ययन तो दूर उसे छूना भी नहीं चाहिए |प्राचीन परंपरा को भी देखें तो इस प्रकार का कट्टरवाद जैनाचार्यों ने कभी पल्लवित नहीं होने दिया |अध्ययन अध्यापन के क्षेत्र में उन्हें कट्टरता बिलकुल पसंद नहीं थी | प्रायः सभी जैनाचार्यों ने अन्य धर्म दर्शनों का अध्ययन भी किया और ईमानदारी पूर्वक पूर्वपक्ष के रूप में उनके सिद्धांतों को भी प्रस्तुत किया | आचार्य सिद्धसेन(३-४शती)ने स्पष्ट कहा -
ज्ञेयः पर सिद्धान्तः , स्वपक्षबलनिश्चयोपलब्ध्यर्थम् | [6]
अर्थात् यदि अपने पक्ष या सिद्धांत की मजबूती का निर्णय भी करना हो तो भी दूसरे के सिद्धांत को जानना आवश्यक है |
पूज्यपाद (६शती )तो जिनेन्द्र देव को वे सभी नाम दे देते हैं जो अन्य धर्म दर्शनों के आराध्य हैं -
“शिवाय धात्रे सुगताय विष्णवे,जिनाय तस्मै सकलात्मने नमः |”[7]
अर्थात् जिनेन्द्र को मेरी वंदना है जिसे शिव, धाता,सुगत,(बुद्ध),विष्णु,या सर्वभूतस्थ कहा जाता है |
आचार्य अकलंक(७ शती ) भी उस एक शुद्ध परमात्मा की ही वंदना करते हैं जिन्हें अनेक नामों से पुकारा जाता है –
तं वन्दे साधुवन्द्यं सकलगुणनिधिं ध्वस्तदोषद्विषन्तम् |
बुद्धं वा वर्धमानं शतदलनिलयं केशवं वा शिवं वा ||[8]
अर्थात् मैं समस्त गुणों के निधि ,सभी दोषरूपी शत्रुओं को ध्वस्त करने वाले तथा सज्जनों के वन्दनीय परमात्मा की वंदना करता हूँ ,जिसे बुद्ध ,महावीर,कमलासन(ब्रह्मा),विष्णु या शिव कहा जाता है |
आचार्य हरिभद्र (८ शती) ने भी जैनदर्शन को पक्षपात रहित तथा तर्कसंगत स्वीकार करते हुए कहा है –
पक्षपातो न मे वीरे , न द्वेषः कपिलादिषु |
युक्तिमद्वचनं यस्य ,तस्य कार्यपरिग्रहः ||[9]
अर्थात् मेरा महावीर से कोइ पक्षपात नहींहै ,न ही कपिल आदि दार्शनिकों से कोई द्वेष है | युक्तियुक्त वचन जिसका भी हो उसे अपना लेना चाहिए |
जैनधर्मदर्शन का पालन करने के लिए दुनिया भर के लौकिक क्रियाकलापों के त्याग की या उन पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध लगाने की भी जैन आचार्यों ने कोई शर्त नहीं बतायी है। आचार्य सोमदेवसूरि(९-१०शती)ने बस इतना कहा है कि
‘‘सर्व एव हि जैनानां प्रमाणं लौकिको विधि:।
यत्र सम्यक्त्सवहानिर्न न चापि व्रतदूषण्।।[10]
अर्थात् जैनों को वे सभी लौकिक क्रिया कलाप ,नियम,विधि या अन्य लोकाचार स्वीकार हैं जिससे सम्यक्त्व की हानि नहीं हो और व्रतों को भी दोष नहीं लगे। दरअसल, जैनाचार्य बड़ी ही उदार एवं व्यापक दृष्टिकोण वाले थे। वे जानते कि क्षेत्रकाल के अनुसार लोकाचार में बहुत सारे परिवर्तन आते ही हैं सभी क्षेत्र कालों में हमारा बाहरी क्रियाकलाप एकसानहीं हो सकता। अत: उन्होंने उस सबका कोई हठाग्रह प्रस्तुत नहीं किया और इसलिए हमें भी उस सब पर कोई हठा ग्रह नहीं रखना चाहिए तथा और अन्य बातें छोड़कर सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्र रूप मूलभूत मोक्षमार्ग की साधना पर ही विशेष ध्यान देना चाहिए।
 उपाध्याय यशोविजय जी (१८ शती )ने तो अध्यात्मसार में जैन दर्शन के नैगम,संग्रह,व्यवहार,ऋजुसूत्र,शब्द,समभिरूढ़ इन सात नयों में अन्य भारतीय दर्शनों को गुम्फित करके जैनदर्शन की विशालता का परिचय बहुत सुन्दर तरीके से दिया है -
बौद्धानामृजुसूत्रतोमतंभूद् वेदान्तिनां संग्रहात् |
साङ्ख्यानां तत एव नैगमनयाद् यौगश्च वैशेषिका ||
शब्दाद्वैतविदोऽपि शब्दनयतः सर्वैनयैर्गुम्फिता |
जैनी दृष्टिरितीह सारतरता प्रत्यक्षमुद्वीक्ष्यते ||
वैचारिक  उदारता  तो जैनाचार्यों की दिखलाई दे ही रही है ,किन्तु अक्सर यह कहा जाता है कि जैन आचार्य  आचारण में शुरू से ही बहुत कट्टर रहे हैं |जैनों की व्रतचर्या ,नियम ,संयम आदि बहुत कठोर होते हैं और शिथिलता उन्हें कथमपि स्वीकार्य नहीं | कहा तो अक्सर यह भी जाता है जैन आचार संहिता की कठोरता के कारण ही इनके पालने वालों की संख्या भी कम होती जा रही है और यही कारण है कि बौद्धों की तरह जैन पूरे विश्व में अपना प्रचार प्रसार नहीं कर पाए |मैं यहाँ विनम्रता पूर्वक  यह कहना चाहता हूँ कि जैनाचार्यों ने वस्तु का सच्चा स्वरुप और मोक्षमार्ग हमें समझाया है | संसार के दुखों का अभाव करने के लिए जो सही मार्ग है उन्होंने वह ही हमें बतलाया है |मात्र अनुयायियों की संख्या बढ़ाने के लिए उस मार्ग को विकृत करके बताने का छल वीतरागी दिगम्बर जैन संत कथमपि नहीं कर सकते थे और न ही कभी किया | आचारगत दृढ़ता को कट्टरता इसलिए भी नहीं कहा जा सकता कि व्रत आदि का सम्बन्ध पूर्णतः व्यक्तिगत होता है |अतः दृढ़ता एक प्रकार का आत्म-अनुशासन है और कट्टरता एक विकृत अनुशासन है ,जो बलात् करवाया जाता है | इस विषय में यदि हम खोज करें तो आचारगत उदारता भी जैन आचार मीमांसा में विद्यमान है | 
संयम तपत्याग आदि की बात को  सर्वत्र यथाशक्तिया शक्तित:शब्द लगाकर ही बतलाया गया है|मूल सूत्रों में ही ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है जैसे शक्तितस्त्याग, शक्तितस्तपइत्यादि।आचार मीमांसा में यह शर्त भी रही कि अपनी शक्ति को छिपाए न ताकि स्वच्छंदता न पनपने लगे और इस बात का भी निर्देश दिया गया कि अपनी शक्ति य सामर्थ्य से बाहर जाकर भी आचरण न करे ताकि अतिवाद न पनपे | सभी जैनाचार्योंने एक स्वर से यह उद्धोष किया है कि
जं सक्कदि तं कीरइ जं च ण सक्कदि तहेव सद्दणं।
सद्दहमाणो जीवो पावदि अजरामरं ठाणं।।[11]
अर्थात् जितना शक्य हो उतना करो और यदि शक्य न हो तो उसकी श्रद्धा अवश्य करो। श्रद्धावान् जीव अजरअमर पद को प्राप्त कर लेता है।
कई बार लोग ज्ञान को लेकर भी बहुत चिंतित होने लगते हैं और निर्णय ही नहीं कर पाते हैं कि कौन से शास्त्र पढ़ें और कौन से नहीं , और कितने शास्त्र पढ़ डालें ? शास्त्रों की संख्या भी बहुत है , भिन्न भिन्न मतों के भिन्न भिन्न शास्त्र हैं और वे भिन्न भिन्न बातें कहते हैं तो हम क्या करें और क्या न करें ? स्वाध्याय के माध्यम से सुलझने की बजाय अपनी कमी के कारण उल्टे उलझ कर रह जाते हैं | इस समस्या से निपटने के लिए भी जैनाचार्यों ने मार्ग सुझाया और सार रूप में कहा -
जीवोऽन्य: पुद्गलश्चान्य: इत्यसौ तत्त्वसंग्रह:।
यदन्यदुच्यते किंचिस्तोऽस्तु तस्यैव विस्तर:।।[12]
अर्थात् जीव भिन्न है ,अजीव भिन्न है –सम्पूर्ण तत्वज्ञान का बस इतना सा ही सार है ,और इसके अलावा अनेक शास्त्रों में जो कथन आया है वह इसका ही विस्तार है | कहने का तात्पर्य यह है कि यदि भेद विज्ञान हो गया तो अनेक शास्त्रों से क्या प्रयोजन ? और यदि भेद ज्ञान नहीं हुआ तो अनेक शास्त्रों के ज्ञान का भी क्या लाभ ?
इस प्रकार और भी अनेक उद्धरण जैन साहित्य में हमें पग पग पर मिलते हैं |सार रूप में  हम देखते हैं कि आचार्यों ने अपनी उदारता से सहज सरल धर्माचरण को कभी बोझिल नहीं होने दिया और अन्य धर्मों दर्शनों  और उनके अनुयायियों के प्रति भी खुला ह्रदय रखा |किसी भी जाति , क्षेत्र , धर्म, भाषा या अन्य किसी भी चीज को  धर्माचरण में बाधक नहीं बनने दिया |



[1]नियमसार , गाथा -१५६
[2]भावपाहुड, गाथा -१५१
[3]रत्नकरंडश्रावकाचार ,श्लोक-२८
[4]देवम्आराध्यम्। विदुर्मन्यन्ते। के ते?‘देवादेवा वि तस्स पणमन्‍ति जस्स धम्मे सया मणोइत्यभिधानात्। कमपि?‘मातङ्गदेहजमपिचाण्डालमपि। कथम्भूतम्? ‘सम्यग्दर्शनसम्पन्नंसम्यग्दर्शनेन सम्पन्नं युक्तम्। अतएव भस्मगूढाङ्गारान्तरौजसंभस्मना गूढ: प्रच्छादित: स चासावङ्गारश्च तस्य अन्तरं मध्यं तत्रैव ओज: प्रकाशो निर्मलता यस्य॥ -आचार्य प्रभाचंद्र कृत संस्कृत टीका 

[5]रत्नकरंडश्रावकाचार ,श्लोक-२६
[6]द्वात्रिन्शिका ८/१९
[7]समाधि शतक -२
[8]अकलंक स्तोत्र /९
[9]लोकतत्वनिर्णय -३८
[10]यशस्तिलचम्पू , ८/३४
[11]दर्शनपाहुड,२२, आचार्य कुन्दकुन्द
[12]इष्टोपदेश, ५० आचार्य पूज्यपाद
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