Friday, March 16, 2018

इस घटना के माध्यम से मैं कुछ कहना चाहता हूँ

इस घटना के माध्यम से मैं कुछ कहना चाहता हूँ ......................

हमने दूसरे समुदाय से क्या सीखा ?और उन्हें क्या सिखाया ?

                                        -  डॉ अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली

 मैं आपको एक नयी ताज़ा सत्य घटना सुनाना चाहता हूँ और उसके माध्यम से बिना किसी निराशा के कुछ कहना भी चाहता हूँ | शायद आप समझ जाएँ |

 अभी मेरा दिल्ली में लोधी कॉलोनी में आयोजित एक सर्व धर्म संगोष्ठी में जाना हुआ | जैन धर्म की तरफ से मुझे प्रतिनिधित्व करना था | वह एक राउंड टेबल परिचर्चा थी जिसमें भाषण देने देश के विभिन्न धर्मों के लगभग २४-२५ प्रतिनिधि पधारे थे | अध्यक्ष महोदय ने सभा प्रारंभ की और सभी को वक्तव्य देने से पहले एक शर्त लगा दी कि आपको अपने धर्म के बारे में कुछ नहीं कहना है | आपको अपने से इतर किसी एक धर्म के समुदाय से आपने कौन सी अच्छी बात सीखी सिर्फ यह बताना है | जाहिर सी बात है मेरी तरह सभी अपने धर्म की विशेषताएं बतलाने के आदी थे और अचानक ये नयी समस्या ? खैर सभी ने खुद को किसी तरह तैयार किया इस अनोखे टास्क के लिए | जो हिन्दू धर्म का विद्वान् था उसने इस्लाम की प्रशंसा करके उनकी एक खूबी बताई जिससे वे प्रभावित थे ,एक मुस्लिम विद्वान् ने वेदांत दर्शन की एक खूबी बतलाई जिससे वे प्रभावित हुए | मैंने सिक्ख समुदाय की एक विशेषता बतलाई जिससे मैं प्रभावित हुआ था | इस तरह सभी ने सभी धर्मों की खूबियों का बखान किया ,किसी धर्म को नहीं छोड़ा |ऐसे धर्म तक चर्चा में आये जो भारत में हैं ही नहीं ,या नाम मात्र के हैं |

यह छुपाने वाली बात नहीं है कि मैं मन ही मन मैं सभी धर्म के प्रतिनिधियों की बातें ध्यान पूर्वक इसलिए सुनता रहा और तरसता रहा कि कोई तो ऐसा होगा जो ये कहेगा कि मैं जैन धर्म और समुदाय से प्रभावित हुआ ,मैंने उनसे यह एक अच्छी बात सीखी | टेबल पर पूरा राउंड होने को था लगभग सभी धर्म समुदाय कवर हो लिए थे | लेकिन अंतिम वक्ता को सुनने के बाद मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि उस सभा में बैठे अपने अपने धर्मों के शीर्ष विद्वानों में से किसी ने सहजता से भी जैन धर्म का जिक्र तक नहीं किया |

मैं स्तब्ध था, जैन समाज के धर्म प्रभावना के सभी धन और समय के खर्चीले कार्यक्रमों के बारे में सोच रहा था | हमने कितनी महावीर जयंतियां मना लीं,कितने जन्म दिवस और दीक्षा दिवस मना लिए,कितने पञ्चकल्याणक हो लिए ,सेवा के लिए कितने स्कूल,कॉलेज,अस्पताल बना डाले,लाखों संस्थाएं बना डालीं  और इसके बदले आज ये देखने को मिल रहा है कि अन्य धर्मों के किसी एक प्रतिनिधि ने भी कुछ नया सीखने को लेकर जैन धर्म ,समुदाय को प्राथमिकता पर नहीं रक्खा | मुझे लगा कुछ परिचित प्रतिनिधियों से चुपचाप कह दूँ कि आप जैन का बताना ताकि इज्जत बच जाए ,लेकिन मैं शांत रहा | मैंने सोचा नहीं ,ये आज हमारी परीक्षा का सही मौका है | सभी स्वतंत्रता से बोल रहे हैं |उन्हें अपने मन से निर्णय करके बोलने दो ,तो ही ठीक रहेगा |

हम तो अपने गिरेबान में झांकेंगे कि आखिर ऐसी कौन सी भूल हम से हो रही है कि हमारी प्रभावना सिर्फ हम तक ही सीमित है ?क्या हम ऐसा कुछ नहीं कर पाए कि दूसरे हमारे धर्म से दिल से प्रभावित हो ? ये सब अंतर्द्वन्द्व मेरे भीतर चल ही रहा था कि सभा समाप्ति की ओर आ गयी और अध्यक्ष जी को अध्यक्षीय देना था | मैंने मानस बनाया कि यदि इन्होंने भी कुछ नहीं बोला तो फिर मैं निवेदन करूँगा | अध्यक्ष जी मेरी मनः स्थिति शायद भांप गए और विनम्र शब्दों में सभी का धन्यवाद दिया और निवेदन किया कि एक जैन धर्म हममें से किसी ने नहीं ले पाया अतः मैं विराम लेने से पूर्व आप से गुजारिश करता हूँ कि डॉ जैन को छोड़ कर अन्य कोई प्रतिनिधि  इस धर्म के बारे में भी बताये कि आपने जैनों से क्या सीखा ? चूंकि हम सभी धर्मों को साथ लेकर चल रहे हैं अतः इस धर्म पर भी चर्चा थोड़ी देर कर दें | उनके निवेदन के उपरान्त सभी ने सांत्वना के रूप में अहिंसा ,अनेकांत आदि सिद्धांतों की प्रशंसा कर डाली | मैंने भी कुछ राहत महसूस की और सभा समाप्त हो गयी |   

सभा तो समाप्त हो गयी लेकिन मैं अन्दर से हिल गया और अभी तक चिंतन मनन कर रहा रहूँ | आत्मनिरीक्षण कर रहा हूँ | किसी की निंदा या स्तुति के मूड में भी नहीं हूँ | पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा है कि हम किसी निरर्थक आत्मप्रवंचना के शिकार होते जा रहे हैं |अपने ही साथ भारी भरकम छल सा कर रहे हैं | दूसरों को अपने रंग में रंगने की कला विकसित करने की जगह सिर्फ मूर्तियाँ रंग रहे हैं , भगवानों को नहलाये जा रहे हैं लेकिन किसी को भी भिगो नहीं पा रहे हैं | पुण्य पाप की स्वार्थी और बाजारू व्याख्याएं कर रहे हैं | कषायों के कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं और खुश हो रहे हैं कि हम सबसे शुद्ध और अच्छे हैं |हम आध्यात्मिक दिखाई तो देना चाहते हैं ,होना नहीं चाहते और प्रयास भी नहीं करते |

हो सकता है यह घटना तात्कालिक एक संजोग मात्र हो | हर समय हर किसी के साथ जरूरी नहीं कि ऐसा अनुभव हो | मेरे साथ भी ऐसा पहली बार ही हुआ है | लेकिन सोचना तो पड़ेगा | आपके पास समय हो तो आप भी विचार कीजिये  .................

कुछ समझ आता नहीं कैसी हो रही हैं साजिशें |

भीगता कुछ भी नहीं और हो रहीं हैं बारिशें ||

यदि आप भी इस विषय में कुछ कहना चाहते हैं तो मुझेdrakjain2016@gmail.comपर ईमेल कर सकते हैं | 

Saturday, March 10, 2018

भारतीय संस्कृति के आराध्य तीर्थंकर ऋषभदेव - डा. अनेकान्त कुमार जैन


ऋषभदेव जयंती पर विशेष
भारतीय संस्कृति के आराध्य तीर्थंकर ऋषभदेव
डा. अनेकान्त कुमार  जैन

मनुष्य के अस्तित्व के लिए रोटी, कपड़ा, मकान जैसे पदार्थ आवश्यक हैं, किंतु उसकी आंतरिक सम्पन्नता केवल इतने से ही नहीं होती। उसमें अहिंसा, सत्य, संयम, समता, साधना और तप के आध्यात्मिक मूल्य भी जुड़ने चाहिए। भगवान् ऋषभदेव ने भारतीय संस्कृति को जो कुछ दिया है, उसमें असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन छह कर्मो के द्वारा उन्होंने जहां समाज को विकास का मार्ग सुझाया वहीं अहिंसा, संयम तथा तप के उपदेश द्वारा समाज की आंतरिक चेतना को भी जगाया।
जन-जन की आस्था के केंद्र तीर्थंकर ऋषभदेव का जन्म चैत्र शुक्ला नवमी को अयोध्या में हुआ था तथा माघ कृष्णा चतुर्दशी को इनका निर्वाण कैलाश पर्वत से हुआ था।इन्हें आदिनाथ के नाम से भी जाना जाता है .इनके पिता का नाम नाभिराय तथा इनकी माता का नाम मरुदेवी था. कुलकर नाभिराज से ही इक्क्षवाकू कुल की शुरुआत मानी जाती है। इन्हीं के नाम पर भारत का एक प्राचीन नाम अजनाभवर्ष भी प्रसिद्ध है . ऋषभदेव प्रागैतिहासिक काल के एक शलाका पुरुष हैं जिन्हें इतिहास काल की सीमाओं में नहीं बांध पाता है किंतु वे आज भी भारत की सम्पूर्ण भारतीयता तथा जन जातीय स्मृतियों में पूर्णत:सुरक्षित हैं। भागवत में कहा है –
 अष्टमेमेरुदेव्यांतुनाभेर्जातउरूक्रमः.
            दर्शयन वर्म धीराणां सर्वाश्रमनमस्कृतम् 
चौबीस तीर्थकरों में ये ही ऐसे तीर्थकर हैं, जिनकी पुण्य-स्मृति जैनेतर भारतीय वाड्.मय और परंपराओं में भी एक शलाका पुरुष के रूप में विस्तार से सुरक्षित है।इनकी दो पुत्रियां ब्राह्मी तथा सुन्दरी नाम से थीं तथा भरत, बाहुबली आदि सौ पुत्र भी थे .इन्होंने अपनी पुत्री ब्राह्मी को लिपि विद्या तथा सुन्दरी को अंक विद्या का ज्ञान सर्वप्रथम देकर स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति का सूत्रपात किया .
यही कारण है कि प्राचीनकाल में सम्राट अशोक ने जिस लिपि में अपने शिलालेख लिखवाये उसका नाम ब्राह्मीलिपि है.यही लिपि विकसित होकर आज देवनागरी के रूप में हमारे सामने है.इनके पुत्र बाहुबली की एक हज़ार वर्ष पुरानी एक शिला पर उत्कीर्ण ५७ फुट विशाल विश्व प्रसिद्ध प्रतिमा कर्णाटक के श्रवणबेलगोला स्थान पर स्थित है .
भगवान् ऋषभदेव का सबसे बड़ा योगदान यही है कि एक राजा के रूप में उन्होंने मनुष्यों को कर्म करना सिखाया ,कई कलायें सिखायीं तथा एक तपस्वी के रूप में उन्हें मुक्ति का मार्ग भी बताया .वे कहते थे ‘कृषि करो और ऋषि बनो’
इस प्रकार भारतीय संस्कृति को उनका अवदान एकांगी होकर सर्वागीण और चतुर्मुखी है। भारतीय संस्कृति के आंतरिक पक्ष को जो योगदान उन्होंने दिया, उसकी चर्चा संसार का प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद इन शब्दों में करता है-
त्रिधा बद्धोवृषभोरोरवीतिमहादेवोमत्यां आ विवेश”
इस मन्त्रांश का सीधा शब्दार्थ है-तीन स्थानों से बंधे हुये वृषभ ने बारंबार घोषणा की कि महादेव मनुष्यों में ही प्रविष्ट हैं। यह घोषणा आत्मा को ही परमात्मा बनाने की घोषणा है। आत्मा में परमात्मा के दर्शन करने के लिए मन, वचन, काय का संयम आवश्यक है। यह त्रिगुप्ति ही वृषभ का तीन स्थानों पर संयमित होना है।
आत्मा ही परमात्मा है, यह घोषणा भारतीय संस्कृति को उन सेमेटिक धर्मो से अलग करती है, जिन धर्मो में परमात्मा को परमात्मा और जीव को जीव माना गया है तथा यह कहा गया है कि जीव कभी परमात्मा नहीं हो सकता। किंतु जैन चिन्तन में जो आत्मा है, वही परमात्मा है- अप्पा सो परमप्पा । ऋषभदेव का यह स्वर इतना बलवान था कि यह केवल जैनों तक सीमित नहीं रहा, अपितु पूरे भारतीय चिंतन में व्याप्त हो गया। उपनिषदों ने भी घोषणा की- अयम् आत्मा ब्रह्म। वेदान्त ने तो इतना भी कह दिया कि सब शास्त्रों का सार यही है कि जीव ही ब्रह्म है- जीवो ब्रह्मैवनापर:यदि धर्म दर्शन के क्षेत्र में भारतीय संस्कृति को गैर-भारतीय संस्कृति से अलग करने वाला व्यावर्त्तकधर्म खोजा जाय तो वह है- आत्मा परमात्मा की एकता और इस तथ्य के अन्वेषण में भगवान् ऋषभदेव प्रभृत शलाका पुरुष का महत्वपूर्ण योगदान है।
जैन तीर्थकर ऋषभदेव को अपना प्रवर्तक तथा प्रथम तीर्थकर मानकर पूजा करते ही हैं, किंतु भागवत् भी घोषणा करता है कि नाभि का प्रिय करने के लिए विष्णु ने मरूदेवी के गर्भ से वातरशना ब्रह्मचारी ऋषियों को धर्म का उपदेश देने के लिए ऋषभदेव के रूप में जन्म लिया-
नाभे: प्रियचिकीर्षया। तदवरोधायने मेरूदेव्यां धर्मान्दर्शयितुकामो वातरशनानां
श्रमणानामृषिणां र्ध्वमन्थिनां शुक्लया तनुवावततारा (श्रीमद्भागवत 5/3/20)

भागवत् के पांचवें स्कंध के पांचवें अध्याय में उस उपदेश का विस्तार से वर्णन है जिसे ऋषभदेव ने दिया था। भारतीय जनता ऋषभदेव के महान उपकारों के प्रति इतनी ज्यादा समर्पित हुई कि कृतज्ञता वश उनके ज्येष्ठ चक्रवर्ती पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष करके गौरव माना- भरताद्भारतं वर्षम्।

नवीं शती के आचार्य जिनसेन के आदिपुराण में तीर्थकर ऋषभदेव के जीवन चरित का विस्तार से वर्णन है। भारतीय संस्कृति के इतिहास में ऋषभदेव ही एक ऐसे आराध्यदेव हैं जिसे वैदिक संस्कृति तथा श्रमण संस्कृति में समान महत्व प्राप्त है।महावीर जयंती कि तरह ऋषभदेव जयंती भी प्रतिवर्ष बहुत धूम धाम से मनाई जाती है .अभी यह परंपरा जैन सम्प्रदाय में प्रचलित है किन्तु यह उत्सव पूरे भारतवर्ष में सभी को मानना चाहिए.

(यह आलेख राष्ट्रीय समाचारपत्र  दैनिक जागरण में प्रकाशित है )