Sunday, November 23, 2014

संस्कृत भाषा को धर्म से जोड़कर देखना गलत है -डॉ अनेकांत कुमार जैन

सादर प्रकाशनार्थ -

संस्कृत भाषा को धर्म से जोड़कर देखना गलत है -डॉ अनेकांत कुमार जैन

संस्कृत को किसी धर्म ,जाति,क्षेत्र के रूप में देखना अज्ञानता है |इसे किसी भी राजनैतिक दल से भी जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए |संस्कृत भाषा में गैर धार्मिक साहित्य भी अत्यधिक मात्रा में है|पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह जी ने भी विश्व संस्कृत सम्मलेन में मेरे सामने विज्ञान भवन में स्पष्ट कहा था "संस्कृत भारत की आत्मा है' |नेहरूजी ने भी संस्कृत का महत्त्व 'भारत एक खोज'में बताया है |

दिक्कत तब होती है जब लोग संस्कृत को मात्र वेद और वैदिक संस्कृति से ही जोड़ कर देखते हैं |संस्कृत कभी सांप्रदायिक भाषा नहीं रही |जैन एवं बौद्ध धर्म दर्शन के हजारों ग्रन्थ मात्र संस्कृत भाषा में रचे गए हैं | आज मोदी सरकार ने राष्ट्र भाषा हिंदी को तवज्जो दी है उसी प्रकार वो संस्कृत प्राकृत तथा पालि भाषा को भी भारतीय शिक्षा पद्धति का अंग बनाना चाहते हैं तो हमें उनका साथ देना चाहिए |

आश्चर्य तो ये है कि जब संस्कृत को हटाया जा रहा था तो किसी ने आवाज बुलंद नहीं की आज जब संस्कृत के अच्छे दिन आ रहें हैं तो तकलीफ हो रही है |इसके साथ साथ संस्कृत के विद्वानों को यह भी समझना होगा कि वैदिक संस्कृति भारत का एक महत्वपूर्ण पक्ष है सम्पूर्ण भारत नहीं |श्रमण संस्कृति के आचार्यों के द्वारा रचित संस्कृत साहित्य की उपेक्षा करके भारतीय संस्कृति की बातें करना बेमानी होगी |आज अधिकांश संस्कृत विभागों तथा विश्वविद्यालयों में जैनाचार्यों द्वारा रचित काव्य,नाटक,व्याकरण,पुराण आदि ग्रन्थ कोर्स में नहीं पढ़ाया जाता |परोक्ष रूप से उनकी यह उपेक्षा कहीं न कहीं इसलिए भी है क्यों कि उनके प्रतिपाद्य विषय वैदिक संस्कृति की विचारधारा से कई मामलों में स्वर से स्वर नहीं मिलाते हैं |उन्हें भी विचार तो करना ही पड़ेगा कि वे वास्तव में भाषा का विकास चाहते हैं कि इस बहाने अपनी विचारधारा का प्रभुत्व |ठीक वैसे ही जैसे कि उर्दू या फारसी के बहाने लोग इस्लाम को आगे बढाने का प्रयास करते हैं |इस प्रवृत्ति से सबसे बड़ा नुकसान भाषा को अपने वजूद के साथ उठाना पड़ता है |उसे अपने धार्मिक साहित्य के कारण किसी का अति प्रेम झेलना पड़ता है तो किसी की अति नफरत |भाषा के मामले में हमें सम्प्रदायवादी सोच से ऊपर उठ कर सोचना ही होगा |यदि किसी भाषा ने किसी धार्मिक साहित्य को संवर्धित किया है तो यह उसका उपकार है अपराध नहीं |इसी प्रकार जर्मन या अन्य कोई भाषा के साथ भी उपेक्षा का वर्ताव नहीं होना चाहिए |लेकिन मुख्यता और गौणता तो होती ही है न |जर्मनी से कहो कि तुम जर्मनी हटा कर संस्कृत लगा दो ,तो क्या यह संभव है ?
नहीं |हर राष्ट्र को अपनी भाषाओँ का ही विकास पहले करना चाहिए |अन्य भाषाओँ का सम्मान करें और उन्हें जो सीखना चाहे उसके लिए पूरी अनुकूलता होनी चाहिए |

मेरा तो पूरा विश्वास है कि जो भी संस्कृत और प्राकृत भाषा को जानता है वह विश्व की कोई भी भाषा पर जल्दी अधिकार प्राप्त कर सकता है |

स्कूलों में संस्कृत भाषा को अनिवार्य रूप से पढ़ाने का जो अभूतपूर्व निर्णय माननीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी जी ने लिया है वह अभिनंदनीय है |भारतीय संस्कृति और मूल्यों को समझाने के लिए संस्कृत पूरे भारत की भाषा रही है |संस्कृत भाषा में भारत की वैदिक और श्रमण संस्कृति के सभी आचार्यों ने दर्शन ज्ञान और विज्ञान के अद्वितीय ग्रंथों की रचना की है और आज भी लगातार इस भाषा में ग्रंथों की रचना हो रही है | भारत में संस्कृत के साथ साथ लोकभाषा के रूप में प्राकृत भाषा भी समानांतर रूप से रही है |इस भाषा में भी हजारों साहित्य,आगमों और ग्रंथों का प्रणयन हुआ है |भारतीय जीवन मूल्य ,दर्शन ,ज्ञान, विज्ञान की अद्वितीय संपदा इस साहित्य में है |लोग संस्कृत को तो जानते भी हैं लेकिन प्राकृत भाषा का नाम भी नहीं जानते |वह प्राकृत भाषा जिसने लगभग सभी भारतीय भाषाओँ और बोलियों को जन्म दिया है |सम्राट अशोक आदि ने अनेक शिलालेख इसी भाषा में खुदवाए हैं और कालिदास –शूद्रक जैसे संस्कृत नाटककारों ने अपने साहित्य में इस भाषा का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है |प्रथम शताब्दी में रची गई रचनाएँ गाहासप्तसती,समयसार,आचारांग आदि बेजोड़ हैं |इस भाषा में भूगोल,खगोल,भौतिकविज्ञान,रसायन विज्ञान,चिकित्सा विज्ञान,गणित शास्त्र,व्याकरण,ज्योतिष आदि के चमत्कृत कर देने वाले अनेक ग्रन्थ हैं | इसी के साथ मेरा एक विनम्र निवेदन यह है कि स्कूलों में जब संस्कृत अनिवार्य रूप से पढाई जाय तब उसमें एक एक अध्याय प्राकृत भाषा,व्याकरण और साहित्य के परिचय के रूप में अवश्य पढ़ाया जाय |इससे बच्चे भारतीय संस्कृति और विज्ञान के एक गौरवमयी इतिहास से परिचित हो सकेंगे |

सादर प्रकाशनार्थ-स्कूलों में प्राकृत भाषा भी पढाई जाय

स्कूलों में प्राकृत भाषा भी पढाई जाय
डॉ अनेकांत कुमार जैन
स्कूलों में संस्कृत भाषा को अनिवार्य रूप से पढ़ाने का जो अभूतपूर्व निर्णय माननीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी जी ने लिया है वह अभिनंदनीय है |भारतीय संस्कृति और मूल्यों को समझाने के लिए संस्कृत पूरे भारत की भाषा रही है |संस्कृत भाषा में भारत की वैदिक और श्रमण संस्कृति के सभी आचार्यों ने दर्शन ज्ञान और विज्ञान के अद्वितीय ग्रंथों की रचना की है और आज भी लगातार इस भाषा में ग्रंथों की रचना हो रही है | भारत में संस्कृत के साथ साथ लोकभाषा के रूप में प्राकृत भाषा भी समानांतर रूप से रही है |इस भाषा में भी हजारों साहित्य,आगमों और ग्रंथों का प्रणयन हुआ है |भारतीय जीवन मूल्य ,दर्शन ,ज्ञान, विज्ञान की अद्वितीय संपदा इस साहित्य में है |लोग संस्कृत को तो जानते भी हैं लेकिन प्राकृत भाषा का नाम भी नहीं जानते |वह प्राकृत भाषा जिसने लगभग सभी भारतीय भाषाओँ और बोलियों को जन्म दिया है |सम्राट अशोक आदि ने अनेक शिलालेख इसी भाषा में खुदवाए हैं और कालिदास –शूद्रक जैसे संस्कृत नाटककारों ने अपने साहित्य में इस भाषा का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है |प्रथम शताब्दी में रची गई रचनाएँ गाहासप्तसती,समयसार,आचारांग आदि बेजोड़ हैं |इस भाषा में भूगोल,खगोल,भौतिकविज्ञान,रसायन विज्ञान,चिकित्सा विज्ञान,गणित शास्त्र,व्याकरण,ज्योतिष आदि के चमत्कृत कर देने वाले अनेक ग्रन्थ हैं | इसी के साथ मेरा एक विनम्र निवेदन यह है कि स्कूलों में जब संस्कृत अनिवार्य रूप से पढाई जाय तब उसमें एक एक अध्याय प्राकृत भाषा,व्याकरण और साहित्य के परिचय के रूप में अवश्य पढ़ाया जाय |इससे बच्चे भारतीय संस्कृति और विज्ञान के एक गौरवमयी इतिहास से परिचित हो सकेंगे |

नोट-*लेखक को प्राकृत भाषा के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार ’महर्षि वादरायण सम्मान -२०१३’से सम्मानित किया जा चुका है | 

Monday, November 10, 2014

क्या हैं असली प्यार के मायनें ?

सादर प्रकाशनार्थ
                क्या हैं असली प्यार के मायनें ?
प्रिय बहना
मधुर स्नेह
      आजकल तुम जिस दौर से गुजर रही हो उसका मुझे अहसास है ।उम्र के इस उफान पर जिस प्रकार हमें अपनी पढाई और कैरियर के प्रति सजग रहना आवश्यक है उसी प्रकार प्यार के रिश्तों संबंधों से निर्मित अपने पारिवारिक और सामाजिक परिवेश के प्रति भी बहुत सजगता जरूरी है ।दोनों ही स्थितिओं में हमें बड़ों के अनुभवों का लाभ उठाना आना चाहिए। आज तुम्हारी जो भावनात्मक और पारिवारिक स्थिति है वैसी स्थिति कमोवेश हर लड़की की होती है ।
         आज तुम अपने पैरों पर खड़ी हो और विवाह के प्रसंग पर स्व-चयनित वर से ही करने की जिद घर वालों के सामने रखी है ।एक ऐसा वर जिसकी पृष्ठभूमि अपने धर्म संस्कृति से बिलकुल जुदा है और तुम्हारी हर जिद और इच्छा की पूर्ती में तत्पर तुम्हारे माता पिता सहित सभी अभिभावक आज तुम्हारी इस जिद को नहीं मान रहे हैं तो तुम्हें वे बहुत बुरे लग रहे हैं ।
        प्यार करना बुरी बात नहीं है ।जब नयी जवानी का सावन आता है और घटायें घुमड़ घुमड़ कर बरसती हैं तो बारिस सब कुछ भिगो देती है तब ऐसे मौसम में बारिश में भीगना कोई जुर्म नहीं है ।मैं इस निश्छल प्रेम को अपराध न मानकर मानवीय स्वभाव मानता हूँ ।किन्तु कभी कभी यह असहज भावनात्मक आवेश सैक्स और वासना के रूप में हमारे जीवन में कुछ अजीब तरह के नाटकीय ढंग से सामने आता है कि हम उसे ही सच्चा प्यार समझने लगते हैं । उसका प्रभाव हमारे दिल और दिमाग पर इस कदर छाने लगता है कि हमें उसके सिवा पूरी दुनिया दुश्मन नज़र आने लगती है ।यहाँ तक कि वे भी जो हमसे प्रेम करते हैं और सिर्फ हमारा हित चाहते हैं ।सुना है वो तुम्हें इतना चाहता है कि घर का इकलौता होते हुए भी तुम्हारे लिए अपने माता पिता ,भाई,बहन ,धर्म आदि सब कुछ ठुकराने को तैयार है |किसी दूसरे शहर में अपनी नयी दुनिया बसाएगा |मुझे आश्चर्य है और तरस आता है तुम्हारी इस समझ पर कि तुम इसे उसका स्वयं के प्रति सच्चा समर्पण और प्यार समझ रही हो ?क्या हो गया है तुम्हें ?इतनी उच्च शिक्षा के बाद भी क्या तुम्हें इतना समझ नहीं आया कि यह प्रेम नहीं स्वार्थ है |अरे ! जो अपनों का न हो सका वो तुम्हारा क्या होगा |तुम्हारा उसका परिचय तो कुछ वर्षों का ही हो सकता है लेकिन अपने माँ बाप के अनंत उपकार और प्यार को वो तुम्हारे मोह में एक क्षण में भूल गया ? ये प्रेम नहीं नशा है जो कभी भी उतर सकता है और यकीन मानो इस प्रकार का नशा विवाह के बाद उतरता ही है |लेकिन तब तक बहुत देर भी हो जाती है |
        मैं प्रेम का प्रबल समर्थक होते हुए भी हमेशा यही कहता हूँ कि पारिवारिक दायित्वों और मूल्यों की बलि चढ़ा कर प्रेम विवाह कभी नहीं करना चाहिए ।सच्चा प्रेम भी होता है लेकिन इसकी परिणति या सार्थकता विवाह में ही पूर्ण होती है यह किसने समझा दिया ?
        तुम्हें मैं कैसे समझाऊं कि सिर्फ प्यार का नाम जिन्दगी नहीं है ।प्यार सिर्फ उसका एक अनिवार्य अंग है ।जो जरूरी तो है पर वह अकेला जिन्दगी के सफर का संवाहक नहीं है ।जिन्दगी में अपने लोगों के प्रेम और विश्वास को भी तबज्जो देनी पड़ती है ।धन;पैसा;समाज ;जाति;कुल;गोत्र;धर्म संस्कृति परिवार रिश्ते - ये सब अर्थहीन नहीं हैं । इनकी समग्रता से ही एक जीवन का निर्माण होता है । एक जिम्मेदार और समझदार युवा सिर्फ क्षणिक भावुकता के लिए इन सभी को छद्म आधुनिकता की आड़ में तिलांजलि नहीं दे सकता ।
प्रेम विवाह के उपरांत भी तुम्हें संसार में इन सभी की आवश्यकता तो पड़ेगी ही | यथार्थ रूप से इनके बिना जीवन संभव ही नहीं दिखाई देगा । लिव-इन की संस्कृति भी कोई बाहर से आयातित नहीं है ।भारतीय संस्कृति के असामाजिक कृत्यों में यह परंपरा ‘रखैल’ के रूप में पाई जाती है ।कुछ स्वार्थी लोग बस नाम बदलकर इस दुराचार को आधुनिकता के नाम पर अपनी वासना पूर्ती का साधन बना रहे हैं ।आश्चर्य यह है कि इसकी सामाजिक स्वीकृति भी चाहते हैं ।‘पहले इस्तेमाल करें ,फिर विश्वास करें’-यह पाश्चात्य जीवन दर्शन हो सकता है,भारतीय जीवन दर्शन तो कतई नहीं है | हम पहले विश्वास करते हैं,फिर कर्तव्य का पालन करते हैं,समर्पण करते हैं ,जिसे अपना माना है उसके लिए अपने सुख का भी त्याग करते हैं और इसे ही प्यार कहते हैं |सार्वजानिक स्थलों पर गले में हाथ डाल कर घूमना ,गले मिलना और चुम्बन लेने को प्यार की संज्ञा देने वाली अन्दर से हताश और निराश पीढ़ी शायद ही यह समझ पाए कि त्याग और समर्पण की क्या कीमत होती है और प्रेम की अतुल गहराइयाँ कैसे नापी जाती हैं |
       प्रेम विवाह भी उचित हो सकता है किन्तु उसकी सफलता भी उसमें निहित मूल्यों पर आधारित होती है उसके अभाव में औसतन इसके पुराने परिणाम बहुत अच्छे नहीं पाए गए हैं। सामाजिक विवाह भी सारे सफल ही होते हों ऐसा भी नहीं है किन्तु उसकी जिम्मेवारी सभी की बनती है और औसतन वे किन्हीं अज्ञात कारणों से ज्यादा सफल पाए गए हैं।तुम्हें शायद कभी कोई अनुभवी यह समझा पाए कि प्रेमविवाह उस कल्पनाशील प्रेम की दर्दनाक समाप्ति का नाम है।
       यथार्थ के धरातल पर प्रेम का वृक्ष यकायक उत्पन्न नहीं होता वो शनैः शनैः धूप गर्मी पानी वायु के सिंचन से अंकुरित होकर पहले पौधा बनता है फिर वर्षों में वृक्ष । तब जाकर उम्र भर छाया और फल देता है ।दुनिया बहुत बड़ी है और समय रहते बात समझ में भाग्य से ही आती है । 
आजकल के माता पिता भी बहुत असहाय होते हैं उन्हें मालूम है कि तुम्हारा प्रेम और विवाह दोनों ही तुम्हारे लिए हितकारी नहीं है फिर भी उन्हें तुम्हारा जिन्दा रहना ज्यादा प्यारा है अतः दिल पर पत्थर रखकर भी हो सकता हैं अंत में हमेशा की तरह तुम्हारी यह जिद भी पूरी कर दें किन्तु वो बात तुम्हें इसलिए समझनी होगी क्यूँ कि जीवन तुम्हारा है और अभी भी समय है।बाद में ऐसा न हो सिवा पछताने के कोई विकल्प ही बाकी न रह जाये ।
     समझना कि प्रेम का वास्तविक अर्थ प्राप्ति नहीं त्याग है ।यह अभी तुम्हारी १८-२० साल की उम्र शायद तुम्हें समझने न दे लेकिन समझना पड़ेगा ।यह वह परीक्षा है जहाँ परीक्षार्थी भी तुम हो और परीक्षक भी तुम हो ।चाहो तो पास हो जाओ नहीं तो विधि और नियति को जो मंजूर है होगा वह ही ।देखो अब निर्णय तुम्हारे हाथ में है| मैंने इस विषय पर किसी जोर जबरजस्ती पर कभी यकीन नहीं किया और न करूंगा लेकिन कुछ समझाने का भाव सिर्फ इसीलिए व्यक्त किया है कि मुझे यह मलाल न रहे और तुम कभी यह शिकायत न करो कि पहले क्यों नहीं बताया |घर के सभी सदस्यों ने तो यही कहा है कि तुम्हें समझाना निरर्थक है ,अब भले ही हो पर मुझे दुःख रहेगा कि तुमने अपने जीवन पर हम किसी को कोई अधिकार नहीं दिया सिवाय खुद के  और उसके |पता नहीं इतने आधुनिक ख्यालातों का होते हुए भी मैं तुम्हारे इस निर्णय पर अपनी सहमति क्यों नहीं रख पा  रहा हूँ ?मुझे आधुनिकता और प्राचीनता से कोई आग्रह नहीं है |हमें तो मूल्यपरक,सुखी और सफल जीवन चाहिए और वो जिन नियमों से मिलें हमें वह अपना लेने चाहिए|  
इस विस्तृत प्रवचन के बाद भी मैं तो यही चाहता हूँ कि तुम्हारा आंकलन सही निकले और तुम  हमेशा  सुखी रहो ।
शेष शुभ
तुम्हारा 
बड़ा भाई
अनेकांत कुमार जैन
ANEKANT KUMAR JAIN 
JIN FOUNDATION 
A93/7A,BEHIND NANDA HOSPITAL ,
CHATTARPUR EXTENTION ,
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