Friday, February 27, 2015

विकास or विनाश

हम यदि सुकून से शुद्ध भोजन नहीं कर पा रहे हैं और रात को सुकून से सो नहीं पा रहे हैं तो ऐसा विकास हमारे विनाश का सूचक है।-
-कुमार अनेकांत

वो मुझे अक्सर सताता बहुत है

वो मुझे अक्सर सताता बहुत है है मुझ पर ज्यादा मेहरबाहर वक्त जताता बहुत है गर मजबूरी में लेना ही पड़ जाये उससे थोड़ी सी मदद महफ़िल में बेवफा बताता बहुत है |-कुमार अनेकांत

Wednesday, February 11, 2015

सादरप्रकाशनार्थ ' आसमान पर कभी मत थूकना ,खुद के ही ऊपर गिरता है'

सादरप्रकाशनार्थ
                                  ' आसमान पर कभी मत थूकना ,खुद के ही ऊपर गिरता है'
-कुमार अनेकांत
मैं दिल्ली जनता की जनता हूँ मैंने अपना फैसला बता दिया |अब इस जीत से सभी गैर भाजपाई हार कर भी खुश हैं |दिक्कत यही है कि इसे भाजपा के विरोध का जनादेश समझा जा रहा है | वे खुश न हों |मेरा दर्द समझें |मुझे मोदी जी कल भी पसंद थे ...आज भी पसंद हैं |इसी तरह केजरीवाल भी कल भी पसंद थे आज भी पसंद हैं |हम क्या करें ?
हम किसी पार्टी के नहीं हैं |पार्टी के आप हैं |आपकी मजबूरी होती है कि मजबूरी में अपनी पार्टी के गलत इंसान को भी सही ठहराना |केजरीवाल बीजेपी से लड़ते तो उन्हें इतनी ही सीटें देते |मोदी आम आदमी पार्टी से लड़ते तो हम उन्हें उसी प्रकार चुनते | हम लोग मानते हैं कि कोई भी पार्टी गलत या सही नहीं होती |हमें व्यक्ति या नेता गलत या सही लगते हैं |
आप के साथ समस्या यह है कि आप हमें वेवकूफ समझते हो |आपने केजरीवाल पर आरोप लगाया कि सरकारी कार या बंगला नहीं लेंगे कह कर आते ही एक अदद कार और चार कमरे का फ्लैट क्यूँ ले लिया ?आपने समझा हम भड़क जायेंगे |हम भी जानते हैं कि उनका अभिप्राय सरकारी ऐय्याशी नहीं करने से था और उन्होंने ऐसा किया | पद यात्रा करके और झोपडी में रह कर सरकार चलाने को हम भी नहीं मानेंगे |आपके निर्थक आरोप हमें रास नहीं आये |
हम वादों के उपलक्षण समझते हैं |हम जानते हैं कि प्रेमिका से जब यह कहा जाता है कि मैं तुम्हें चाँद तारे ला कर दे सकता हूँ तब उसका अर्थ यही होता है कि मैं तुम्हें अन्य लोगों कि अपेक्षा बहुत अधिक चाहता हूँ और विवाह के बाद यदि वह उसे प्रेम पूर्वक किसी बीच पर ले जा कर भेलपुड़ी और गोल गप्पे खिलाने का भी समय निकाल ले तो पत्नी को वो चाँद तारों जैसा ही लगता है |पत्नी को आपकी नौकरी,व्यस्तता से शिकायत नहीं है वो जानती है कि ये नहीं करेंगे तो गृहस्थी नहीं चलेगी |लेकिन उसे तब अपनी अत्यधिक उपेक्षा बर्दाश्त नहीं होती जब आपको उसकी हफ्ते में एक बार भी याद नहीं आती |ऐसा ही हाल हमारा है ...लेकिन उससे कुछ ठीक क्यूँ कि हम पांच साल में अपने आका बदल सकते हैं |
आप इस जीत का यह अर्थ कदापि न लगायें कि हमारा भरोसा मोदी जी पर कम हो गया है |Modi PM ,Kejri CM का नारा हम बहुत पहले दे चुके थे | बस दोनों पार्टी को ये नारा आधा आधा ही रास आ रहा था तो इसमें हमारी कोई गलती नहीं | हम आप नहीं हो सकते और आप हम नहीं हो सकते |
प्रिय राष्ट्र सेवक राजनैतिक दलों से हमारा इतना ही कहना है कि हार या जीत सिद्धांतों के मापदंड तय करने का तराजू नहीं है ,बस एक अनुमान सा है जो आत्म मंथन को मजबूर करता है |लोकसभा में जब केजरीवाल हारे थे तब भी वे हमारी नजरों से नहीं हारे थे | प्रचार में शिष्टाचार हमेशा याद रखना |बुरे को बुरा कहोगे तो एक बार चल भी जायेगा लेकिन अच्छे को बुरा कहोगे तो नहीं चलेगा | आसमान की तरफ मुंह करके कभी मत थूकना ,वो खुद के ऊपर गिरता है |यही हाल मोदी विरोधियों का भी हुआ था और अब केजरीवाल विरोधियों का भी हुआ | हम ही राष्ट्रवादी हैं ,हम ही सेवक हैं ,हम ही संप्रदाय निरपेक्ष हैं ,हम ही ईमानदार है ,हम ही विकास कर सकते हैं ................ऐसा मात्र कहने और पोस्टर छापने से कुछ नहीं होगा |ऐसा हमें लगना भी चाहिए ..और लगेगा तभी जब आप कुछ ऐसा करोगा और यदि कुछ कम भी कर सके ,मगर ऐसा पवित्र भाव भी सच्चे मन से रखोगे तो ..तो हमें वैसा लगेगा और हम वैसा मानेंगे |आगे से ध्यान रखना हम किसी पार्टी के नहीं हैं हम उसी के हैं जो दिल से हमारा है ,राष्ट्र का है |

Saturday, January 24, 2015

चुनाव को जंग न कहा जाय

सेवा में                                                                      24/1/2015
मुख्य चुनाव आयुक्त
चुनाव आयोग
दिल्ली

विषय -चुनाव को जंग न कहा जाय

महोदय ,

आप लोकतंत्र के सजग प्रहरी हैं |मैं आज आपका ध्यान एक ऐसे विषय की तरफ दिलाना चाहता हूँ जिस पर प्रायः विचार नहीं किया जाता है |आपसे निवेदन है कि स्वस्थ्य चुनाव के लिए आप जो जो भी नए प्रयोग करते हैं उसमें एक प्रयोग 'उचित एवं अहिंसक शब्द प्रयोग 'का भी प्रारंभ करें |मेरी सलाह है कि आयोग को शब्द्प्रयोगों को लेकर पत्रकारिता के लिए भी आचार संहिता लगा देना चाहिए |
   
 उदाहरण के लिए  चुनाव के साथ "लड़ना" जैसे शब्दों का प्रयोग ही उसे युद्ध जैसा विकृत कर देता है ;चुनाव में "भाग लेना" शब्द का प्रयोग ज्यादा स्वस्थ्य लोकतान्त्रिक मानसिकता है ।और भी अनेक उदाहरण हैं जैसे  'हमला बोला'......'परास्त किया' ....'सिंहासन की लड़ाई'....'चुनावी जंग'......'पलटवार'....'भितरघात'.....आदि शब्दों का प्रयोग ऐसा वातावरण बना देता है मानो चुनाव नहीं कोई युद्ध हो रहा हो |
             
 स्वस्थ्य लोकतंत्र में उम्मीदवार चुनाव में भाग लेते हैं ....लड़ते नहीं हैं |हम उम्मीदवार चुनते हैं किसी को जिताते या हराते नहीं हैं |कुछ निश्चित लोग जो लोगों को ज्यादा उचित लगते हैं वे राष्ट्र सेवा के लिए चुन लिए जाते हैं |और जो नहीं चुने गए वे अन्य विधाओं से राष्ट्र सेवा करें...ऐसा जनता का मंतव्य रहता है |


आशा है आप इस विषय पर गंभीरता से विचार करेंगे |

धन्यवाद

डॉ अनेकांत कुमार जैन
anekant76@gmail.com 

Sunday, November 23, 2014

संस्कृत भाषा को धर्म से जोड़कर देखना गलत है -डॉ अनेकांत कुमार जैन

सादर प्रकाशनार्थ -

संस्कृत भाषा को धर्म से जोड़कर देखना गलत है -डॉ अनेकांत कुमार जैन

संस्कृत को किसी धर्म ,जाति,क्षेत्र के रूप में देखना अज्ञानता है |इसे किसी भी राजनैतिक दल से भी जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए |संस्कृत भाषा में गैर धार्मिक साहित्य भी अत्यधिक मात्रा में है|पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह जी ने भी विश्व संस्कृत सम्मलेन में मेरे सामने विज्ञान भवन में स्पष्ट कहा था "संस्कृत भारत की आत्मा है' |नेहरूजी ने भी संस्कृत का महत्त्व 'भारत एक खोज'में बताया है |

दिक्कत तब होती है जब लोग संस्कृत को मात्र वेद और वैदिक संस्कृति से ही जोड़ कर देखते हैं |संस्कृत कभी सांप्रदायिक भाषा नहीं रही |जैन एवं बौद्ध धर्म दर्शन के हजारों ग्रन्थ मात्र संस्कृत भाषा में रचे गए हैं | आज मोदी सरकार ने राष्ट्र भाषा हिंदी को तवज्जो दी है उसी प्रकार वो संस्कृत प्राकृत तथा पालि भाषा को भी भारतीय शिक्षा पद्धति का अंग बनाना चाहते हैं तो हमें उनका साथ देना चाहिए |

आश्चर्य तो ये है कि जब संस्कृत को हटाया जा रहा था तो किसी ने आवाज बुलंद नहीं की आज जब संस्कृत के अच्छे दिन आ रहें हैं तो तकलीफ हो रही है |इसके साथ साथ संस्कृत के विद्वानों को यह भी समझना होगा कि वैदिक संस्कृति भारत का एक महत्वपूर्ण पक्ष है सम्पूर्ण भारत नहीं |श्रमण संस्कृति के आचार्यों के द्वारा रचित संस्कृत साहित्य की उपेक्षा करके भारतीय संस्कृति की बातें करना बेमानी होगी |आज अधिकांश संस्कृत विभागों तथा विश्वविद्यालयों में जैनाचार्यों द्वारा रचित काव्य,नाटक,व्याकरण,पुराण आदि ग्रन्थ कोर्स में नहीं पढ़ाया जाता |परोक्ष रूप से उनकी यह उपेक्षा कहीं न कहीं इसलिए भी है क्यों कि उनके प्रतिपाद्य विषय वैदिक संस्कृति की विचारधारा से कई मामलों में स्वर से स्वर नहीं मिलाते हैं |उन्हें भी विचार तो करना ही पड़ेगा कि वे वास्तव में भाषा का विकास चाहते हैं कि इस बहाने अपनी विचारधारा का प्रभुत्व |ठीक वैसे ही जैसे कि उर्दू या फारसी के बहाने लोग इस्लाम को आगे बढाने का प्रयास करते हैं |इस प्रवृत्ति से सबसे बड़ा नुकसान भाषा को अपने वजूद के साथ उठाना पड़ता है |उसे अपने धार्मिक साहित्य के कारण किसी का अति प्रेम झेलना पड़ता है तो किसी की अति नफरत |भाषा के मामले में हमें सम्प्रदायवादी सोच से ऊपर उठ कर सोचना ही होगा |यदि किसी भाषा ने किसी धार्मिक साहित्य को संवर्धित किया है तो यह उसका उपकार है अपराध नहीं |इसी प्रकार जर्मन या अन्य कोई भाषा के साथ भी उपेक्षा का वर्ताव नहीं होना चाहिए |लेकिन मुख्यता और गौणता तो होती ही है न |जर्मनी से कहो कि तुम जर्मनी हटा कर संस्कृत लगा दो ,तो क्या यह संभव है ?
नहीं |हर राष्ट्र को अपनी भाषाओँ का ही विकास पहले करना चाहिए |अन्य भाषाओँ का सम्मान करें और उन्हें जो सीखना चाहे उसके लिए पूरी अनुकूलता होनी चाहिए |

मेरा तो पूरा विश्वास है कि जो भी संस्कृत और प्राकृत भाषा को जानता है वह विश्व की कोई भी भाषा पर जल्दी अधिकार प्राप्त कर सकता है |

स्कूलों में संस्कृत भाषा को अनिवार्य रूप से पढ़ाने का जो अभूतपूर्व निर्णय माननीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी जी ने लिया है वह अभिनंदनीय है |भारतीय संस्कृति और मूल्यों को समझाने के लिए संस्कृत पूरे भारत की भाषा रही है |संस्कृत भाषा में भारत की वैदिक और श्रमण संस्कृति के सभी आचार्यों ने दर्शन ज्ञान और विज्ञान के अद्वितीय ग्रंथों की रचना की है और आज भी लगातार इस भाषा में ग्रंथों की रचना हो रही है | भारत में संस्कृत के साथ साथ लोकभाषा के रूप में प्राकृत भाषा भी समानांतर रूप से रही है |इस भाषा में भी हजारों साहित्य,आगमों और ग्रंथों का प्रणयन हुआ है |भारतीय जीवन मूल्य ,दर्शन ,ज्ञान, विज्ञान की अद्वितीय संपदा इस साहित्य में है |लोग संस्कृत को तो जानते भी हैं लेकिन प्राकृत भाषा का नाम भी नहीं जानते |वह प्राकृत भाषा जिसने लगभग सभी भारतीय भाषाओँ और बोलियों को जन्म दिया है |सम्राट अशोक आदि ने अनेक शिलालेख इसी भाषा में खुदवाए हैं और कालिदास –शूद्रक जैसे संस्कृत नाटककारों ने अपने साहित्य में इस भाषा का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है |प्रथम शताब्दी में रची गई रचनाएँ गाहासप्तसती,समयसार,आचारांग आदि बेजोड़ हैं |इस भाषा में भूगोल,खगोल,भौतिकविज्ञान,रसायन विज्ञान,चिकित्सा विज्ञान,गणित शास्त्र,व्याकरण,ज्योतिष आदि के चमत्कृत कर देने वाले अनेक ग्रन्थ हैं | इसी के साथ मेरा एक विनम्र निवेदन यह है कि स्कूलों में जब संस्कृत अनिवार्य रूप से पढाई जाय तब उसमें एक एक अध्याय प्राकृत भाषा,व्याकरण और साहित्य के परिचय के रूप में अवश्य पढ़ाया जाय |इससे बच्चे भारतीय संस्कृति और विज्ञान के एक गौरवमयी इतिहास से परिचित हो सकेंगे |

सादर प्रकाशनार्थ-स्कूलों में प्राकृत भाषा भी पढाई जाय

स्कूलों में प्राकृत भाषा भी पढाई जाय
डॉ अनेकांत कुमार जैन
स्कूलों में संस्कृत भाषा को अनिवार्य रूप से पढ़ाने का जो अभूतपूर्व निर्णय माननीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी जी ने लिया है वह अभिनंदनीय है |भारतीय संस्कृति और मूल्यों को समझाने के लिए संस्कृत पूरे भारत की भाषा रही है |संस्कृत भाषा में भारत की वैदिक और श्रमण संस्कृति के सभी आचार्यों ने दर्शन ज्ञान और विज्ञान के अद्वितीय ग्रंथों की रचना की है और आज भी लगातार इस भाषा में ग्रंथों की रचना हो रही है | भारत में संस्कृत के साथ साथ लोकभाषा के रूप में प्राकृत भाषा भी समानांतर रूप से रही है |इस भाषा में भी हजारों साहित्य,आगमों और ग्रंथों का प्रणयन हुआ है |भारतीय जीवन मूल्य ,दर्शन ,ज्ञान, विज्ञान की अद्वितीय संपदा इस साहित्य में है |लोग संस्कृत को तो जानते भी हैं लेकिन प्राकृत भाषा का नाम भी नहीं जानते |वह प्राकृत भाषा जिसने लगभग सभी भारतीय भाषाओँ और बोलियों को जन्म दिया है |सम्राट अशोक आदि ने अनेक शिलालेख इसी भाषा में खुदवाए हैं और कालिदास –शूद्रक जैसे संस्कृत नाटककारों ने अपने साहित्य में इस भाषा का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है |प्रथम शताब्दी में रची गई रचनाएँ गाहासप्तसती,समयसार,आचारांग आदि बेजोड़ हैं |इस भाषा में भूगोल,खगोल,भौतिकविज्ञान,रसायन विज्ञान,चिकित्सा विज्ञान,गणित शास्त्र,व्याकरण,ज्योतिष आदि के चमत्कृत कर देने वाले अनेक ग्रन्थ हैं | इसी के साथ मेरा एक विनम्र निवेदन यह है कि स्कूलों में जब संस्कृत अनिवार्य रूप से पढाई जाय तब उसमें एक एक अध्याय प्राकृत भाषा,व्याकरण और साहित्य के परिचय के रूप में अवश्य पढ़ाया जाय |इससे बच्चे भारतीय संस्कृति और विज्ञान के एक गौरवमयी इतिहास से परिचित हो सकेंगे |

नोट-*लेखक को प्राकृत भाषा के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार ’महर्षि वादरायण सम्मान -२०१३’से सम्मानित किया जा चुका है |