Saturday, January 20, 2018

आचार्य महाप्रज्ञ की दृष्टि में गोमटेश्वर' -डॉ अनेकान्त कुमार जैन

'आचार्य महाप्रज्ञ की दृष्टि में गोमटेश्वर'

-डॉ अनेकान्त कुमार जैन , नई दिल्ली

कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में स्थित विश्व प्रसिद्ध भगवान गोमटेश्वर बाहुबली की दिगम्बर खड्गासन प्रतिमा के जो भी दर्शन करता है वह अभिभूत हो जाता है ।

श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के यशस्वी आचार्य महाप्रज्ञ जी जब आचार्य श्री तुलसी जी के साथ श्रवणबेलगोला ,कर्नाटक के सुप्रसिद्ध गोमटेश्वर की प्रतिमा के सम्मुख 15 मई 1969  को ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी के दिन पधारे थे तब गोमटेश बाहुबली की विशाल प्रतिमा के दर्शन करके उन्होंने संस्कृत श्लोक के माध्यम से भगवान गोमटेश की मूर्ति को देख कर अपनी भक्ति अपनी दार्शनिक शैली में प्रकट की है ।

वे गोमटेश्वर की प्रतिमा के विभिन्न अंगों को अनंत शक्ति का स्रोत बताते हुए कहते हैं -

शक्तिर्व्यक्तिं याति बाहुद्वयेन,ज्ञानालोको मस्तकस्थो विभाति ।
आलोकानां माध्यमं चक्षुरेतत् , मोहाSभावो  व्यज्यते पुंस्कचिन्है: ।।

अर्थात्
मनुष्य अनंत शक्ति का स्रोत है उसकी मुख्य शक्तियां चार हैं -ज्ञान ,दर्शन ,वीर्य और पवित्रता । मनुष्य के शरीर में इन चारों शक्तियों की अभिव्यक्ति के चार स्थान हैं -

1. प्रथम ज्ञान का स्थान है- मस्तक ,

2.द्वितीय दर्शन का स्थान है- चक्षु ।

3.तृतीय वीर्य का स्थान है -बाहुद्वय ।

4.चतुर्थ पवित्रता का स्थान है - पुंस्कचिन्ह ।

विशाल मूर्ति को आंखों से पीते हुए अभिभूत कवि मन सहज कह उठता है -

 शक्तिः समस्ता त्रिगुणात्मिकेयं , प्रत्यक्षभूता परिपीयतेSत्र |
स्फूर्त्ताः स्वभावाः सकलाश्च भावाः ,मूर्ता इहैवात्र विलोक्यमानाः ।।

अर्थात्
 आज हम त्रिगुणात्मक शक्ति - ज्ञान ,दर्शन और पवित्रता का साक्षात् अनुभव करते हुए भगवान् बाहुबली की इस विशाल मूर्ति को आंखों से पी रहे हैं यहां सारे स्वभाव और भाव स्फूर्त और मूर्त हुए से लगते हैं ।

वे भगवान बाहुबली को स्वतंत्रता का प्रथम दीप मानते हुए कहते हैं-


स्वतंत्रतायाः प्रथमोSस्ति दीपोः ,नतो न वा यत्स्खलितः क्वचिन्न ।
त्यागस्य पुण्यः प्रथमः प्रदीपः,परम्पराणां प्रथमा प्रवृत्तिः ।।

 अर्थात्
महान् बाहुबली स्वतंत्रता के प्रथम दीपक थे । वह ना तो कहीं झुके और ना कहीं स्खलित हुए । वे त्याग के प्रथम प्रदीप और परंपरा प्रवर्तक में अग्रणी थे ।

विंध्यगिरी का सौंदर्य और विशाल मूर्ति को बहुत ही सुंदर शब्दों में संजोते हुए आचार्य महाप्रज्ञ कहते हैं -

समर्पणस्याद्यपदं विभाति, विसर्जनं मानपदे प्रतिष्ठम् ।
शैलेशशैलीं विदधत्स्वकार्ये , शैलेश एष प्रतिभाति मूर्त्तः ।।

अर्थात् महान् बाहुबली समर्पण के आदि प्रवर्तक और विसर्जन के मानदंड थे , यह शैलेश बाहुबली पर्वतराज की सारी संपदा को स्वगत किए हुए आंखों के सामने खड़े हैं ।

   इस प्रकार महान संस्कृतज्ञ और दार्शनिक आचार्य महाप्रज्ञ जी ने गणाधिपति आचार्य तुलसी जी के  साथ ससंघ भगवान गोमटेश्वर के दर्शन किये और अपने आशुकवित्व के माध्यम से अपनी दार्शनिक और साहित्यिक भक्ति की अभिव्यक्ति संस्कृत छंदों में प्रस्तुत की ।

Tuesday, January 16, 2018

इस कहानी के माध्यम से मैं कुछ कहना चाहता हूँ ००००


इस कहानी के माध्यम से मैं कुछ कहना चाहता हूँ ००००

किसी की प्रेरणा से उसने मंदिर आना शुरू ही किया था ,

पहले ही दिन किसी काले पुजारी ने उसे काली टी शर्ट के लिए उसे बहुत बुरी तरह से टोक दिया ,

उसे लगा यदि काला रंग इतना अशुभ है तो काली चमड़ी के मनुष्यों को भी पूजा नहीं करनी चाहिए

एक दिन वह रात में मंदिर आया और घंटा बजाया तो किसी ने उसे रात में घंटा बजाने से यह कह कर मना किया कि इससे हिंसा होती है  और शोर होता है,वह मान गया ।

बाद में उसने मंदिर में ही रात को सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ढ़ोल मजीरे आर्केस्ट्रा बजते देखा तो उसे बहुत बुरा लगा, ये दोहरे मानदंड देखकर ।

उसने प्रवचन में सुना कि धन संग्रह नहीं करना चाहिए ,और ज्ञान का अभ्यास करना चाहिए , फिर प्रवचन के बाद उसने करोड़ो की बोलियां सुनी और सबसे बड़े परिग्रही का सम्मान ,ज्ञानी पंडित जी से ज्यादा होते देखा तो उसका कंफ्यूजन बढ़ गया ।

एक दिन मंदिर में पूजा के दौरान  अचानक उसका मोबाइल बजने लगा......

हद तो तब हुई जब
पूजा समाप्त हुई तो सभी पुजारियों ने उसे बुरी तरह ज़लील कर दिया ....

बाद में उसने एक अपरिग्रही साधू को मंदिर में ही भक्तों  से मोबाइल पर बात करते देखा ।

वो शरम से पानी पानी होता मंदिर से बाहर निकल आया और खुद से मन में बोलता हुआ के अब मैं मन्दिर नहीं आऊंगा..
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कुछ दिन बाद उसके दोस्त उसे चर्च ले गये ...._
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वहाँ उसके हाथ से एक मोमबत्ती गिर गयी ,वो पादरी को अपनी तरफ आते देख कर डर गया,
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पादरी ने आते ही पूछा  आप जल तो  नहीं गए ?

वो हैरान होकर उन्हें देखता रहा और मुश्किल से 'नहीं' शब्द उसके मुँह से निकला.......
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पादरी ने किसी को बोला - इन्हें दूसरी दे दो ......
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प्रार्थना के दौरान भी अचानक उसका muteफ़ोन vibrate हुआ,वह चुपचाप 2 मिनट बाहर बात करके पुनः वापस प्रेयर करने लगा

प्रार्थना के बाद कई अंजान अपरिचितों ने उससे हालचाल पूछा , उससे रहा नहीं गया और उसने बताया
कि उसकी माँ के अलावा उसका कोई नहीं है और वह कैंसर से जूझ रही है ।मैं कभी धर्म पर विश्वास नहीं करता था,मां रोज मंदिर जाती थीं ,मैंने सोचा उनके लिए मुझे भगवान् की पूजा अवश्य करनी चाहिए ।

वहां खड़े अनेक लोगों ने उनके लिए प्रार्थना की ,कई लोगों ने खर्च का भी पूछा,किसी ने एक बड़े डॉक्टर का नंबर भी दिया जो चर्च के लोगों को निःशुल्क देख लेते हैं । वो जब भी वहां जाता ,सभी उनका हाल चाल पूछते ।

फिर वो खुद से मन में बोलता  हुआ ....अब मैं रोज़ समय निकालकर चर्च आया  करूँगा,चर्च वाले मेरी इज्जत,फिक्र करते हैं ...........
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क्या हम नरमी से नहीं बोल सकते ...?

क्या मन्दिर जी के लोग उस आदमी के पास जाकर प्यार से उसके घर की ख़ैरियत नही पूछ सकते थे ?

कि भाई सब कुशल मंगल तो है ?जो आपको पूजा के वक्त भी मोबाइल लाना पड़ा ...कोई इमेरजेंसी या हमारी मदद की जरूरत तो नही ?

मुझे क्षमा कीजियेगा यह सन्देश उन लोगों के लिये है जिनकी वजह से कई बार हमारी युवा पीढ़ी धर्म से विमुख हो जाती है....!

ध्यान रखें मंदिर में कोई आपके पास नौकरी करने नहीं आया है,बल्कि प्रभु की उपासना करने आया है ।

हो सकता है मेरे और आप की सोच में फ़र्क़ हो 

फिर भी विचार ज़रूर कीजियेगा


https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1207850682636581&id=100002349810642

Saturday, December 30, 2017

'नए साल में मौन तोड़ने का हो संकल्प’

'नए साल में मौन तोड़ने का हो संकल्प

-      डॉ अनेकान्त कुमार जैन,नई दिल्ली 

निःसंदेह आध्यात्मिक दृष्टि से,स्वास्थ्य की दृष्टि से ,शिष्टाचार ,सम्मान और शांति आदि कई मायनों में मौन रहना एक अच्छे व्यक्तित्व की निशानी है । वह एक साधना भी है । मौन रहने के जितने भी लाभ गिनाए जायें उतने कम  हैं ।कहा गया है –
मौनं सर्वार्थसाधकम्
किन्तु हर समय मौन रहना भी हानिकारक है । खासकर तब जब सब कुछ लुट रहा हो ।
कहा भी है –
'अति का भला न बोलना ,अति की भली न चूप'
कुछ प्रसंग ऐसे भी होते हैं जब सज्जनों को बिल्कुल चुप नहीं रहना चाहिये ।

ग्यारहवीं शताब्दी के आचार्य शुभचंद्र लिखते हैं -
धर्मनाशे क्रियाध्वंसे स्वसिद्धान्तार्थविप्लवे ।
अपृष्टैरपि वक्तव्यं तत्स्वरूपप्रकाशने ।।    
 (ज्ञानार्णव/545)
अर्थात् जब धर्म का नाश हो रहा हो , आगम सम्मत क्रिया नष्ट हो रही हो , आगम या सिद्धांत का गलत अर्थ लगाया जा रहा हो तब विद्वानों को  बिना पूछे भी यथार्थ स्वरूप को बतलाने वाला व्याख्यान / कथन जरूर करना चाहिए । 
ऐसे वक्त पर उन्हें मौन बिल्कुल नहीं रहना चाहिए । इस समय का मौन एक किस्म का अपराध ही है । हमारा मौन उस अनर्थ का समर्थन बन जाता है । उक्ति प्रसिद्ध है - 
'मौनं स्वीकृतिलक्षणम् ' या ‘मौनं सम्मतिदर्शनम्’
 अर्थात् मौन सहमति का सूचक होता है । 
वर्तमान में हम एक ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं जहां असत्य और अनाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले के साथ ऐसा वर्ताव होता है मानों वो कोई अपराधी हो । आज व्यक्तिवाद इतना अधिक हावी है कि असत्य का विरोध करो तो व्यक्ति अपना विरोध समझता है । ग़लत को ग़लत कहना भी अपराध बना दिया गया है । विपक्ष को स्थायी रूप से विरोधी मान लिया गया है । दूसरी तरफ अधिकांश बुद्धिजीवी भी स्वार्थी ,अवसरवादी, लोभी और चाटुकार किस्म के हो गए हैं । 
हम अपनी सुरक्षा के प्रति ज़्यादा चिंतित हैं , इसलिए स्व सुरक्षित लेखन,स्व सुरक्षित भाषण,स्व सुरक्षित मौन में ज्यादा यकीन रखने लगे है । हम अक्सर बहुत चतुराई से ऐसे मौकों पर भी तटस्थ हो जाते हैं जब हमें सत्य के साथ किसी भी कीमत पर खड़े होना चाहिए । खुद को सबकी नज़र में भले बने रहने की आदत हम इस आधार पर विकसित करते हैं कि क्या पता कब किस सज्जन या दुर्जन से अपना काम पड़ जाए । कुछ बोलकर या किसी एक का पक्ष लेकर हम किसी के भी बुरे क्यों बनें
हम अक्सर सभाओं में ऐसे वक्त पर भी मौन रहना ठीक मानते हैं जब मिथ्या सिद्धियां हो रहीं हों, स्वार्थी प्रस्ताव पारित हो रहे हों आदि आदि ,वो भी सिर्फ इस भय से कि कुछ बोलेंगे या विरोध करेंगे तो मुझे ही  आमंत्रण मिलना बंद हो जाएंगे । पद मिलना बंद हो जायेंगे या इनाम मिलने की संभावना खत्म हो जाएगी आदि । पर यह कब तक चलेगा ?
*रोशनी भी गर अंधरों से डरने लगेगी,तो बोलो ये दुनिया कैसे चलेगी* ?
एक कवि ने लिखा है -
'जब चारों ओर मचा हो शोर
सत्य के विरुद्ध,
तब हमें बोलना ही चाहिए,
सर कटाना पड़े या न पड़े
तैयारी तो उसकी
होनी ही चाहिए ।'

दिनकर जी की यह पंक्तियां उनके ऊपर लिखी गयी है जो ऐसे वक्त में भी तटस्थ या चुप रहने में समझदारी समझते हैं -
'समर शेष है , नहीं पाप का भागी केवल व्याध ।
जो तटस्थ हैं ,समय लिखेगा उनके भी अपराध ।।'
नए वर्ष की शुभकामनाओं के साथ -

नए वर्ष में हम नया संकल्प लेंगे ।
हो सत्य का हनन तो जरूर बोलेंगे ।।
-       Dr ANEKANT KUMAR JAIN ,NEW DELHI

Also can send your opinion to  drakjain2016@gmail.com


Saturday, November 18, 2017

गोमटेश के दर्शन से विकार भागता है ना कि उत्पन्न होता है”

दिगंबर गोमटेश के दर्शन से विकार भागता है ना कि उत्पन्न होता है”

डॉ अनेकांत कुमार जैन,नई दिल्ली 

दिगंबर जैन सम्प्रदाय के परम आराध्य जिनेन्द्र देव या तीर्थंकरों की खड्गासन मुद्रा में निर्वस्त्र और नग्न प्रतिमाओं को लेकर खासे संवाद होते रहते हैं | नग्नता को अश्लीलता के परिप्रेक्ष्य में भी देखकर पीके जैसी फिल्मों में इसे मनोविनोद के केंद्र भी बनाने जैसे प्रयास होते रहते हैं | दिगंबर जैन मूर्तियों के पीछे जो दर्शन है ,जो अवधारणा है उसे समझे बिना ही अनेक अज्ञानी लोग कुछ भी कथन करने से पीछे नहीं रहते | इस विषय को आज के विकृत समाज को समझाना असंभव नहीं तो कठिन जरूर है | सुप्रसिद्ध जैन मनीषी सिद्धान्ताचार्य पण्डित कैलाशचंद्र शास्त्री जी ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘जैनधर्म’ में मूर्तिपूजा के प्रकरण में पृष्ठ ९८ -१०० तक इसकी सुन्दर व्याख्या की है जिसमें उन्होंने सुप्रसिद्ध साहित्यकार काका कालेलकर जी का वह वक्तव्य उद्धृत किया है जो उन्होंने श्रवणबेलगोला स्थित सुप्रसिद्ध भगवान् गोमटेश बाहुबली की विशाल नग्न प्रतिमा को देखकर प्रगट किये थे |

वे लिखते हैं - जैन मूर्ति निरावरण और निराभरण होती है जो लोग सवस्त्र और सालंकार मूर्ति की उपासना करते हैं उन्हें शायद नग्न मूर्ति अश्लील प्रतीत होती है | इस संबंध में हम अपनी ओर से कुछ ना लिखकर सुप्रसिद्ध साहित्यकार काका कालेलकर के वे उद्गार यहां अंकित करते हैं जो उन्होंने श्रवणबेलगोला में स्थित भगवान बाहुबली की प्रशांत किंतु नग्न मूर्ति को देखकर अपने एक लेख में व्यक्त किए थे |

वे लिखते हैं – ‘सांसारिक शिष्टाचार में आसक्त हम इन मूर्ति को देखते ही मन में विचार करते हैं कि मूर्ति नग्न है | हम मन में और समाज में भांति भांति की मैली वस्तुओं का संग्रह करते हैं ,परंतु हमें उससे नहीं होती है घृणा और नहीं आती है लज्जा |  परंतु नग्नता देखकर घबराते हैं और नग्नता में अश्लीलता का अनुभव करते हैं | इसमें सदाचार का द्रोह है और यह लज्जास्पद है | अपनी नग्नता को छिपाने के लिए लोगों ने आत्महत्या भी की है परंतु क्या नग्नता वस्तुतः अभद्र है वास्तव में श्रीविहीन है ऐसा होता तो प्रकृति को भी इसकी लज्जा आती | पुष्प नग्न होते हैं पशु पक्षी नग्न ही रहते हैं | प्रकृति के साथ जिन्होंने एकता नहीं खोई है ऐसे बालक भी नग्न ही घूमते हैं | उनको इसकी शर्म नहीं आती और उनकी निर्व्याजता के कारण हमें भी इसमें लज्जा जैसा कुछ प्रतीत नहीं होता | लज्जा की बात जाने दें | इसमें किसी प्रकार का अश्लील, विभत्स, जुगुप्सा, विश्री अरोचक हमें लगा है | ऐसा किसी भी मनुष्य को अनुभव नहीं | इसका कारण क्या है ? कारण यही कि नग्नता प्राकृतिक स्थिति के साथ स्वभाव शुदा है | मनुष्य ने विकृत ध्यान करके अपने मन के विकारों को इतना अधिक बढ़ाया है और उन्हें उल्टे रास्ते की ओर प्रवृत्त किया है कि स्वभाव सुंदर नग्नता उसे सहन नहीं होती | दोष नग्नता का नहीं है पर अपने कृत्रिम जीवन का है | बीमार मनुष्य के समक्ष परिपथ को फल पौष्टिक मेवा और सात्विक आहार भी स्वतंत्रता पूर्वक रख नहीं सकते | यह दोष उन खाद्य पदार्थों का नहीं पर मनुष्य के मानसिक रोग का है | नग्नता छिपाने में नग्नता की लज्जा नहीं, पर  इसके मूल में विकारी पुरुष के प्रति दया भाव है, रक्षणवृति है | पर जैसे बालक के सामने-नराधम भी सौम्य और निर्मल बन जाता है वैसे ही पुण्यपुरुषों के सामने वीतराग विभूतियों के समक्ष भी शांत हो जाते हैं | जहां भव्यता है, दिव्यता है, वहां भी मनुष्य पराजित होकर विशुद्ध होता है | मूर्तिकार सोचते तो माधवीलता की एक शाखा जंघा के ऊपर से ले जाकर कमर पर्यंत ले जाते | इस प्रकार नग्नता छिपानी अशक्य नहीं थी | पर फिर तो उन्हें सारी फिलोसोफी की हत्या करनी पड़ती | बालक आपके समक्ष नग्न खड़े होते हैं | उस समय वे कात्यायनी व्रत करती हुई मूर्तियों के समान अपने हाथों द्वारा अपनी नग्नता नहीं छुपाते | उनकी लज्जाहीनता उनकी नग्नता को पवित्र करती है | उनके लिए दूसरा आवरण किस काम का है ?’

‘जब मैं (काका कालेलकर) कारकल के पास गोमटेश्वर की मूर्ति देखने गया, उस समय हम स्त्री, पुरुष, बालक और वृद्ध अनेक थे | हम में से किसी को भी इस मूर्ति का दर्शन करते समय संकोच जैसा कुछ भी मालूम नहीं हुआ | अस्वाभाविक प्रतीत होने का प्रश्न ही नहीं था | मैंने अनेक मूर्तियां देखी हैं और मन विकारी होने के बदले उल्टा इन दर्शनों के कारण ही निर्विकारी होने का अनुभव करता है | मैंने ऐसी भी मूर्तियां तथा चित्र देखें हैं कि जो वस्त्र आभूषण से आच्छादित होने पर भी केवल विकार प्रेरक और उन्मादक जैसी प्रतीत हुई हैं | केवल एक औपचारिक लंगोट पहनने वाले नग्न साधु अपने समक्ष वैराग्य का वातावरण उपस्थित करते हैं | इसके विपरीत सिर से पैर पर्यंत वस्त्राभूषणों से लदे हुए व्यक्ति आपके एक इंगित मात्र से अथवा अपने नखरे के थोड़े से इशारे से मनुष्य को अस्वस्थ कर देते हैं, नीचे गिरा देते हैं | अतः हमारी नग्नता विषयक दृष्टि और हमारा विकारों की ओर सुझाव दोनों बदलने चाहिए | हम विकारों का पोषण करते जाते हैं और विवेक रखना चाहते हैं |’

इसके बाद पण्डित कैलाशचन्द्र शास्त्री जी लिखते हैं कि ‘काका साहब के इन उद्गारों के बाद नग्नता के संबंध में कुछ कहना शेष नहीं रहता | अतः जैन मूर्तियों की नग्नता को लेकर जैनधर्म के संबंध में जो अनेक प्रकार के अपवाद फैलाए गए हैं वह सब सांप्रदायिक प्रद्वेषजन्य गलतफहमी के ही परिणाम हैं | जैन धर्म वीतरागता का उपासक है | जहां विकार है, राग है, कामुक प्रवृत्ति है, वही नग्नता को छिपाने की प्रवृत्ति पाई जाती है | निर्विकार के लिए उसकी आवश्यकता नहीं है | इसी भाव से जैन मूर्तियां नग्न होती हैं | उनके मुख पर सौम्यता और विरागता होती है | उनके दर्शन से विकार भागता है ना कि उत्पन्न होता है |’

Thursday, November 16, 2017

दुष्ट स्वभावी को सम्यक्त्व नहीं होता'

'दुष्ट स्वभावी को सम्यक्त्व नहीं होता'

खुद्दो रुद्दो रुठ्ठो , अणिट्ठ पिसिणो सगव्वियो-सूयो ।
गायण-जायण-भंडण-दुस्सण-सीलो दु सम्म-उमुक्को ।।

आचार्य कुन्दकुन्द ,रयणसार,44

अनेकान्तानुवाद -

छोटे मन वाले
क्रोध के स्वामी
हर बात पर नाराज होते
पर अनिष्ट इच्छाधारी
चुगली करते फिरते
ईर्ष्या में डूबे रहते
अभिमान के
शिखर पर चढ़ते
कलह में आनंद लेते
याचना में गीत गाते
दूसरों पर दोष देते
इस प्रवृत्ति के मुमुक्षु
सम्यक्त्व से हैं रहित होते

गाथार्थ -

क्षुद्र और रौद्र(क्रोध) स्वभाव वाले  , बात बात पर रुष्ट (नाराज )होने वाले,दूसरों का अनिष्ट चाहने या करने वाले , चुगलखोर, अभिमानी,ईर्ष्यालु,गायक,याचक,कलह करने वाले और दूसरों को दोष लगाने वाले----ये सब सम्यक्त्व रहित होते हैं ।

प्रस्तुति -

डॉ अनेकान्त कुमार जैन , नई दिल्ली

Wednesday, September 27, 2017

गोमटेश दर्शन से हो जाती है सारे तनावों से मुक्ति




सादर प्रकाशनार्थ

'गोमटेश दर्शन से हो जाती है सारे तनावों से मुक्ति'

-डॉ अनेकांत कुमार जैन,नई दिल्ली

कर्णाटक के हासन जिले में चेनरैपाटन के पास श्रवणबेलगोला एक ऐसा तीर्थ स्थान है जहाँ जाने मात्र से मनुष्य अनेक शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्त हो सकता है |मानसिक सुख और शांति के लिए द्रव्य,क्षेत्र, काल, भाव सभी की शुद्धि और मंगल आवश्यक है | ऐतिहासिक दृष्टि से यह महज एक संयोग मात्र नहीं है कि हजारों सालों से यह स्थान साधना और सल्लेखना का मुख्य केंद्र रहा है,बल्कि यह इस क्षेत्र की आध्यात्मिक और भौगोलिक पवित्रता का प्रभाव रहा कि साधना के अनुकूल मानसिक और आत्मिक सुख और शांति के लिए यह स्थान समस्त मुनि परंपरा के लिए आकर्षण का केंद्र रहा |

समाधिमरण के यहाँ के शिलालेखीय दस्तावेज इस बात के सबसे बड़े प्रमाण हैं कि जीवन के अंत में मानसिक शांति पूर्वक संयम और साधना के साथ देह विसर्जित करने के लिए इस स्थान को सर्वश्रेष्ठ माना गया |

यहाँ दो पर्वत हैं – १.विन्ध्यगिरी पर्वत २. चंद्रगिरी पर्वत | विन्ध्यगिरी पर्वत की संरचना कुछ इस प्रकार की है कि नंगे पैर वंदना करने से मनुष्य के भीतर के सभी आज्ञाचक्र स्वतः क्रिया शील हो उठते हैं | मनुष्य न अधिक थकता है और न अधिक भार महसूस करता है | श्वास की गति तीव्र होने से अन्दर की धमनियों में रक्त प्रवाह तीव्र हो उठता है जिससे शरीर के सभी अंगों ,प्रत्यंगों में क्रिया शीलता स्वतः बढ़ जाती है |यहाँ की आरंभिक सीढियाँ पर्वत के पत्थर को ही काट कर निर्मित की गयीं हैं अतः वे न तो ज्यादा बड़ी हैं न ज्यादा छोटी अतः उच्च रक्त चाप तथा ह्रदय के रोगियों के लिए धीरे धीरे मध्यम गति से वंदना करने से उनके स्वास्थ्य के लिए ये वरदान है |

श्वासोच्छ्वास स्वतः ही कभी तीव्र कभी मंद हो जाता है उसे करना नहीं पड़ता अतः यह स्वाभाविक प्राणायाम मस्तिष्क के तंतुओं को जागृत कर देता है जिससे सर दर्द तनाव आदि में लाभ होता है |

मध्य में जो जिनालय आते हैं उनमें झुक कर जाना तथा तीन आवर्त पूर्वक वंदना मुद्रा में बैठ कर तीन बार शिरो वंदन करना अपने आप में एक अद्भुत योग है |जिनालयों की प्राचीन विशाल प्रतिमाओं का पवित्र आभा मंडल हमारे आभा मंडल में प्रवेश कर जाता है तथा वह इतना शक्ति शाली होता है कि हमारे आभा मंडल में संग्रहीत नकारात्मक उर्जा को सकारात्मक उर्जा में परिवर्तित कर देता है |

मध्य जिनालयों तथा मार्ग स्थित शिलालेखों में प्राचीन कन्नड़ लिपि में उत्कीर्ण अक्षर विन्यास का दर्शन हमारी मानसिक उलझनों को अनायास ही खींच कर संतुलित कर देता है | उसके अनंतर सीडियां कुछ बड़ी हो जाती हैं जो हमारे उत्कर्ष और पुरुषार्थ की भावना को उठाती हैं |

हम जब उन्हें पार करते हैं तो प्रथम द्वार से ही गगन चुम्बी उत्तुंग बाहुबली की मूर्ती का वीतरागी प्रशांत मुद्रा युक्त चेहरा हमारे समस्त विकल्प जालों को ख़ारिज करता हुआ हमें निर्विकल्प दर्शन की ओर ले जाता है | पुनः एक छोटा सा द्वार हमें झुकाता है और फिर विशाल बाहुबली का दर्शन हमें इतना उठा देता है कि जन्मों जन्मों का मिथ्यात्व एक क्षण में नष्ट हो जाता है और हमें पता लगता है कि यही है – सम्यक्दर्शन | राग स्वतः नष्ट होने लगता है |

बाहुबली हमें अपने वैराग्य के बाहुपाश में मानो खींच लेते हैं | थोड़ी देर को सही पर हम भी वीतरागी हो जाते हैं | उस परिकर में मनुष्य और उसका अहंकार स्वतः ही बहुत छोटा हो जाता है | हर दर्शनार्थी को लगता है कि मैं ,मेरा मान ,मेरा वैभव,मेरा ज्ञान,मेरा कुल,मेरी परंपरा,मेरी परेशानियाँ,मेरा तनाव सब छोटे हैं ,तुच्छ हैं |

वैराग्य और वीतरागता के समुन्दर में गोते लगाता हुआ दर्शनार्थी मानसिक तनाव जैसे तुच्छ रोगों को पास भी नहीं फटकने देता | मूर्ति का विशालकायत्व और शक्तिशाली प्रभाव हमारी जनम जनम की सभी वासनाओं को तिरोहित कर के शुद्धता की प्राप्ति करने में बहुत बड़ा निमित्त बन जाता है |

चंद्रगिरी पर्वत भी अपनी बनावट और अद्भुत शिल्प सौंदर्य के साथ मनुष्यों की उस प्यास को बुझाने का काम करता है जो उसे सांस्कृतिक बोध के अभाव में तड़फा रही है | शब्द,चेतना और कला की बारीकियां जब मनुष्यों के भाव अस्तित्व से लुप्त होने लगती हैं तो इनसे रीता उसका कोरा अध्यात्म उसे त्राण नहीं दे पाता है यहाँ आकर उसे लगता है कि वह आचार्य भद्रबाहु और चन्द्रगुप्त से बातें कर सकता है ,ज्ञान विज्ञान का प्राचीन वैभव देखकर उसका आत्म वैभव जागृत होता है |

संसार ,शरीर और भोगों से विरक्त हजारों ज्ञानियों के चरण हजारों वर्षों से जिस पर्वत पर आचरण का इतिहास लिख रहें हों ,उस पर्वत पर जब हमारे चरण पड़ते हैं तो हम भी कब उस आचरण की गंगा में तैरने लगते हैं ,हमें स्वयं पता नहीं लगता | यहाँ के वसदियों में हजारों सालों तक मन्त्रों के उच्चारण हुए हैं ,आगमों की गाथाएं गाई गयीं हैं ,स्तुतियों के कीर्तिमान रचे गए हैं | यहाँ के एक एक परमाणुओं में वे शब्द ,वे ध्वनियाँ खचित प्रतीत होतीं हैं | जब हम उन वसदियों में प्रवेश करते हैं तो वे शब्द ,वे ध्वनियाँ हमारे कानों में गूजनें लगती हैं |

हम उन शताब्दियों में विचरण करने लगते हैं जब भद्रबाहु ,कुन्दकुन्द,समन्तभद्र ,पूज्यपाद ,नेमिचंद्र आदि महामुनि रहा करते थे | ऐसे वातावरण की अनुभूति करने वाला कभी तनाव में नहीं रह सकता और अवसाद तो आसपास भी नहीं फटक सकता |